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महंगा डीजल बढ़ाएगा आपका मोबाइल बिल, टेलिकॉम कंपनियों का बिगड़ा बजट
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 11 Sep 2018 05:56 PM IST
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महंगा होता डीजल न सिर्फ आपकी रसोई का बजट बिगाड़ रहा है, बल्कि इसकी मार अब मोबाइल बिल पर भी पड़ने वाली है। डीजल की कीमत में बढ़ोतरी से दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों का परिचालन खर्च बढ़ गया है और अगर ईंधन यूं ही महंगा होता रहा, तो कंपनियां दरों में बढ़ोतरी कर सकती हैं।
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बीते आठ माह के दौरान 5 लाख मोबाइल टावरों के परिचालन में डीजल का खर्च करीब 22 फीसदी बढ़ गया है। संचार कंपनियां 200 करोड़ लीटर डीजल का इस्तेमाल इन टावरों के लिए करती हैं, जिसकी लागत 9,000 करोड़ रुपये सालाना है।
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सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया (सीओएआई) के प्रबंध निदेशक राजन मैथ्यू के मुताबिक, डीजल के दाम में बढ़ोतरी दूरसंचार क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। इस क्षेत्र के सेल टावर को चलाने वाले जनरेटर डीजल पर निर्भर हैं, ऐसे में डीजल की लगातार बढ़ती कीमत से दूरसंचार कंपनियों की लागत बढ़ी है।
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कंपनियां मंत्रालय से लगाएंगी गुहार
टावर एवं इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाता संघ (टीएआईपीए) के प्रबंध निदेशक टीआर दुआ के मुताबिक, अगर इसी तरह डीजल महंगा होता रहा, तो टावर कंपनियां जल्द संचार मंत्रालय से सहायता की मांग करेंगी। दूसरा रास्ता यह है कि बढ़ोतरी का भार ग्राहकों पर डाला जाए। हालांकि दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि ग्राहकों पर भार डालने की स्थिति तभी आएगी, जब डीजल के दाम में करीब 30 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो जाएगी।
कुल डीजल खपत में 1.5 फीसदी हिस्सेदारी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण देश में पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इस बीच, राजस्थान और आंध्र प्रदेश ने तेल की कीमतों पर लगने वाला वैट कम किया है, जबकि केंद्र ने स्पष्ट कर दिया है कि तेल के बढ़ते दाम पर उसका कोई जोर नहीं है।
देश में डीजल की कुल खपत में मोबाइल टावरों की हिस्सेदारी डेढ़ फीसदी है। इस क्षेत्र में भारी प्रतिस्पर्धा के चलते अभी तक कंपनियों ने ग्राहकों से लागत वसूलने पर कोई कदम नहीं बढ़ाया है, लेकिन लगातार घटता मुनाफा और परिचालन का बढ़ता खर्च उन्हें दरों में बढ़ोतरी पर मजबूर कर सकता है।
गौरतलब है कि वोडाफोन, जियो और एयरटेल देश में प्रमुख दूरसंचार कंपनियां हैं, जिनके बीच भारी प्रतिस्पर्धा है। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनएल इन सेवा प्रदाता कंपनियों से ढांचागत और सेवाएं मुहैया कराने के मामले में काफी पीछे है।