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US Tariffs: ट्रंप के जवाबी टैरिफ का भारत को फायदा या नुकसान, कैसे खुद अमेरिका को झेलनी पड़ सकती है परेशानी?
Thu, 03 Apr 2025 06:12 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 03 Apr 2025 06:12 PM IST
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सार
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राष्ट्रपति ट्रंप से मिलते पीएम मोदी
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय समयानुसार बुधवार देर रात को अपने अधिकतर व्यापारिक साझेदारों की तरफ से होने वाले आयात पर टैरिफ लगाने का एलान कर दिया। ट्रंप ने इन्हें रेसिप्रोकल टैरिफ यानी पारस्परिक टैरिफ नाम दिया है। अमेरिकी सरकार ने बताया है कि भारत की ओर से अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सभी सामानों पर 27% का एकसमान टैरिफ लगाया जाएगा। ट्रंप ने अपने व्यापारिक साझेदारों पर 10% से 49% तक का जवाबी टैरिफ लगाने का एलान किया।अमर उजाला ने इन टैरिफ के संबंध में कई सवालों के जवाब स्पष्ट करने की कोशिश की। मसलन भारत पर ट्रंप के एलान का क्या असर होने वाला है? किन भारतीय उद्योगों पर इसका कितना असर होने की संभावना है? इसके अलावा शेयर बाजार पर अमेरिकी प्रशासन के नए टैरिफ का असर कितना और कब तक दिखने की संभावना है? खुद अमेरिका पर इसका क्या असर पड़ सकता है? इसके अलावा बाकी देशों के मुकाबले भारत के लिए कहां मौका और कहां नुकसान हो सकता है? आइए जानते हैं...
भारत पर क्या हो सकता है अमेरिका के टैरिफ का असर?
केडिया सिक्योरिटीज के निदेशक और रिसर्च हेड अजय केडिया ने बताया- भारत ने अमेरिका से आयात होने वाली कई चीजों पर टैरिफ लगाया था। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की कोशिश थी कि वह भारत पर जवाबी आयात शुल्क लगाएं। इसलिए जो प्रभाव रहेगा, वह हमारे आईटी सेक्टर, टेक्सटाइल, एग्रीकल्चर पर असर पड़ सकता है। अभी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता बाकी है। खासकर मुक्त व्यपार समझौते को लेकर।
दूसरी तरफ अगर आयात शुल्क को लेकर बात करें तो हमारी स्थिति बेहतर इसलिए है, क्योंकि हमारे आसपास के देशों और कुछ अन्य निर्यातक देशों पर टैरिफ हमसे भी ज्यादा लगाया गया है। चीन पर ट्रंप प्रशासन ने 54 फीसदी तक टैरिफ लगा दिया है (34 अभी और 20 फीसदी का एलान पहले हुआ)।
US: भारतवंशी सांसदों ने ट्रंप के टैरिफ लगाने के फैसले को बताया गैरजिम्मेदाराना, बोले- आत्मघाती साबित होगा
केडिया सिक्योरिटीज के निदेशक और रिसर्च हेड अजय केडिया ने बताया- भारत ने अमेरिका से आयात होने वाली कई चीजों पर टैरिफ लगाया था। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की कोशिश थी कि वह भारत पर जवाबी आयात शुल्क लगाएं। इसलिए जो प्रभाव रहेगा, वह हमारे आईटी सेक्टर, टेक्सटाइल, एग्रीकल्चर पर असर पड़ सकता है। अभी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता बाकी है। खासकर मुक्त व्यपार समझौते को लेकर।
दूसरी तरफ अगर आयात शुल्क को लेकर बात करें तो हमारी स्थिति बेहतर इसलिए है, क्योंकि हमारे आसपास के देशों और कुछ अन्य निर्यातक देशों पर टैरिफ हमसे भी ज्यादा लगाया गया है। चीन पर ट्रंप प्रशासन ने 54 फीसदी तक टैरिफ लगा दिया है (34 अभी और 20 फीसदी का एलान पहले हुआ)।
US: भारतवंशी सांसदों ने ट्रंप के टैरिफ लगाने के फैसले को बताया गैरजिम्मेदाराना, बोले- आत्मघाती साबित होगा
केडिया के मुताबिक, इस लिहाज से देखा जाए तो आज हमारी स्थिति अन्य निर्यातक देशों से ज्यादा बेहतर है। अपैरल्स और ऑटो के क्षेत्र की बात करें तो हम पर फर्क थोड़ा ज्यादा पड़ेगा, क्योंकि इन क्षेत्रों पर टैरिफ सबसे ज्यादा बढ़ा है। लेकिन अगर प्रतियोगी स्तर पर देखा जाए तो अन्य देशों पर टैरिफ ज्यादा लगा है। लेकिन चूंकि हमारे उत्पादों पर अमेरिका ने आयात शुल्क लगाया है, इसलिए कुछ सेक्टर्स पर प्रभाव तो पड़ा है, क्योंकि अमेरिका में आयात शुल्क लगने के बाद इन चीजों की कीमतें बढ़ेंगी। इससे आने वाले समय में भारत के निर्यात में कुछ कमी आ सकती है। लेकिन निर्यात में हमारा सबसे बड़ा प्रतियोगी चीन है और वहां टैरिफ का बोझ हमसे ज्यादा रहेगा। इसलिए हमारे उत्पाद अमेरिका में चीन के मुकाबले कुछ हद तक सस्ते रहेंगे और इससे हमें फायदा मिलेगा।
उदाहरण के तौर पर अगर अमेरिका ने भारत से आयात किए गए चावल पर 27 फीसदी टैरिफ लगाया तो पहले 100 रुपये में भारतीय चावल पा रहे लोगों को अब आयात शुल्क के साथ 127 रुपये में चावल मिलेगा। हालांकि, चीन के मामले में यह टैरिफ कम से कम 34 फीसदी और अधिकतम 54 फीसदी तक रह सकता है। यानी चीन के चावल की कीमत अमेरिका में 134 से 154 रुपये तक पहुंच सकती है, जो कि भारत के चावल के मुकाबले काफी ज्यादा है। कुछ यही स्थिति बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका के मामले में भी होगा। यानी निर्यातक देशों में भारत की स्थिति सबसे बेहतर रहेगी।
क्या शेयर बाजार पर भी फर्क पड़ेगा?
अगर ट्रंप के एलान का असर उतना ज्यादा पड़ना होता तो हमें आज के दिन ही दिख जाता। एक कहावत है- 'शेर आया, शेर आया'। 20 जनवरी को जब डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद संभाला, उस दिन से ही सबको पता था कि वे प्रमुख निर्यातक देशों पर टैरिफ लगाएंगे। वे पहले से भी इसके बारे में बताते रहे थे। ऐसे में देशों को पता था कि ट्रंप ऐसा फैसला लेंगे और उन्होंने कमर कस ली थी। इसकी वजह से ही शेयर बाजार शुरुआत में कुछ गिरने के बाद संभल गया। ऐसे में यह कह सकते हैं कि भारत का मार्केट काफी परिपक्व है।
आगे अहम रहेगा कि भारत और अमेरिका आने वाले समय में कैसे मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर कैसे डील करते हैं। मोदी सरकार इस मुद्दे से कैसे निपटते हैं। हमें एक एफटीए तो करना है, ऐसे में जो भी समझौता होगा, वह आज की स्थिति से बेहतर की तरफ ही ले जाएगा। इसलिए लंबी अवधि में भारत को ट्रंप के टैरिफ से राहत रहेगी। इसी के चलते मार्केट उतना निगेटिव नहीं हुआ, जितना सोचा जा रहा था।
अगर ट्रंप के एलान का असर उतना ज्यादा पड़ना होता तो हमें आज के दिन ही दिख जाता। एक कहावत है- 'शेर आया, शेर आया'। 20 जनवरी को जब डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद संभाला, उस दिन से ही सबको पता था कि वे प्रमुख निर्यातक देशों पर टैरिफ लगाएंगे। वे पहले से भी इसके बारे में बताते रहे थे। ऐसे में देशों को पता था कि ट्रंप ऐसा फैसला लेंगे और उन्होंने कमर कस ली थी। इसकी वजह से ही शेयर बाजार शुरुआत में कुछ गिरने के बाद संभल गया। ऐसे में यह कह सकते हैं कि भारत का मार्केट काफी परिपक्व है।
आगे अहम रहेगा कि भारत और अमेरिका आने वाले समय में कैसे मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर कैसे डील करते हैं। मोदी सरकार इस मुद्दे से कैसे निपटते हैं। हमें एक एफटीए तो करना है, ऐसे में जो भी समझौता होगा, वह आज की स्थिति से बेहतर की तरफ ही ले जाएगा। इसलिए लंबी अवधि में भारत को ट्रंप के टैरिफ से राहत रहेगी। इसी के चलते मार्केट उतना निगेटिव नहीं हुआ, जितना सोचा जा रहा था।
अमेरिका पर कितना असर?
अमेरिका में मौजूदा समय में महंगाई दर 2.8 फीसदी के करीब है, लेकिन चूंकि अमेरिका के कई क्षेत्र आयात पर निर्भर हैं। जैसे अपैरल, ऑटोमोबाइल के लिए वह चीन, बांग्लादेश व अन्य देशों पर निर्भर है। ऐसे में अब आयात शुल्क लगाकर अमेरिका कई अहम चीजों पर को खुद ही महंगा कर लेगा। इससे वहां महंगाई बढ़ने की संभावना है। बताया जा रहा है कि अमेरिका में इस फैसले के बाद महंगाई दर 4.5 फीसदी तक पहुंच सकती है।
इसका असर यह होगा कि अमेरिका में जो ब्याज दरें घटाने की बात चल रही थी, उसकी संभावना एक बार फिर कम हो जाएगी। चूंकि ब्याज दर कम नहीं होगी, इसलिए लोगों के हाथ में पैसा भी कम रहेगा, खर्च करने की प्रवृत्ति कम होगी। इससे अमेरिका की आर्थिक रफ्तार धीमी हो जाएगी, जिससे मंदी का खतरा बढ़ सकता है। हम पहले सोच रहे थे कि यह खतरा 15-20 फीसदी है। अब वह 30-40 फीसदी तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा उद्योगों के लिए आयात का खर्च बढ़ सकता है, जिसकी वजह से कॉरपोरेट मार्जिन कम हो सकता है। इसकी वजह से बीते कुछ दिनों की ही बात कर लें तो अमेरिकी बाजार- जैसे नैसडैक और डाउ जोन्स में ज्यादा हलचल रही है। अमेरिका में इस पूरी स्थिति के चलते नौकरियों में कमी आ सकती है।
US Tariffs Impact: ट्रंप के टैरिफ से भारत पर क्या असर; कृषि-ऑटो, दवा क्षेत्र कितने होंगे प्रभावित; जानें सबकुछ
अमेरिका में मौजूदा समय में महंगाई दर 2.8 फीसदी के करीब है, लेकिन चूंकि अमेरिका के कई क्षेत्र आयात पर निर्भर हैं। जैसे अपैरल, ऑटोमोबाइल के लिए वह चीन, बांग्लादेश व अन्य देशों पर निर्भर है। ऐसे में अब आयात शुल्क लगाकर अमेरिका कई अहम चीजों पर को खुद ही महंगा कर लेगा। इससे वहां महंगाई बढ़ने की संभावना है। बताया जा रहा है कि अमेरिका में इस फैसले के बाद महंगाई दर 4.5 फीसदी तक पहुंच सकती है।
इसका असर यह होगा कि अमेरिका में जो ब्याज दरें घटाने की बात चल रही थी, उसकी संभावना एक बार फिर कम हो जाएगी। चूंकि ब्याज दर कम नहीं होगी, इसलिए लोगों के हाथ में पैसा भी कम रहेगा, खर्च करने की प्रवृत्ति कम होगी। इससे अमेरिका की आर्थिक रफ्तार धीमी हो जाएगी, जिससे मंदी का खतरा बढ़ सकता है। हम पहले सोच रहे थे कि यह खतरा 15-20 फीसदी है। अब वह 30-40 फीसदी तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा उद्योगों के लिए आयात का खर्च बढ़ सकता है, जिसकी वजह से कॉरपोरेट मार्जिन कम हो सकता है। इसकी वजह से बीते कुछ दिनों की ही बात कर लें तो अमेरिकी बाजार- जैसे नैसडैक और डाउ जोन्स में ज्यादा हलचल रही है। अमेरिका में इस पूरी स्थिति के चलते नौकरियों में कमी आ सकती है।
US Tariffs Impact: ट्रंप के टैरिफ से भारत पर क्या असर; कृषि-ऑटो, दवा क्षेत्र कितने होंगे प्रभावित; जानें सबकुछ
अमेरिका ने फिलहाल फार्मास्यूटिकल सेक्टर, डिफेंस और सेमीकंडक्टर जैसे सेक्टर्स को टैरिफ के दायरे से बाहर रखा है। बाकी सेक्टर्स में उन्हें लगता है कि अमेरिका अधिकतर चीजों को आयात करने की जगह इन्हें अपने घर में ही बना सकता है। लेकिन अमेरिका को कैपेसिटी बिल्डिंग यानी उतनी क्षमता तक पहुंचने में भी समय लग सकता है।
क्या भारत भी अमेरिका पर जवाबी आयात शुल्क लगा सकता है?
भारत अपनी बातचीत के जरिए समझौते करने की नीति के लिए जाना जाता है। अगर भारत को कोई कार्रवाई करनी होती तो वह पहले ही इस तरफ काम शुरू कर देता। लेकिन भारत के मामले में हमने देखा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान हमने अपना स्टैंड निष्पक्ष (न्यूट्रल) रखा। भारत को पता है कि जब कभी लड़ाई होती है तो हमें झुकना भी पड़ता है या कदम पीछे भी खींचने होते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के मामले में भी भारत को बाद में इसका फायदा मिला और हमारी जीडीपी लगातार स्थिर रही है।
भारत ने अमेरिका की तरफ से पारस्परिक टैरिफ लगाने के एलान से पहले कुछ नीतियां बदली हैं। ऐसे में भारत जवाबी कार्रवाई की जगह, अमेरिका से बातचीत कर समझौते की कोशिश करेगा, ताकि हमारे उद्योगों पर प्रभाव तो भले ही पड़े, लेकिन ज्यादा असर न हो।
भारत अपनी बातचीत के जरिए समझौते करने की नीति के लिए जाना जाता है। अगर भारत को कोई कार्रवाई करनी होती तो वह पहले ही इस तरफ काम शुरू कर देता। लेकिन भारत के मामले में हमने देखा कि रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान हमने अपना स्टैंड निष्पक्ष (न्यूट्रल) रखा। भारत को पता है कि जब कभी लड़ाई होती है तो हमें झुकना भी पड़ता है या कदम पीछे भी खींचने होते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के मामले में भी भारत को बाद में इसका फायदा मिला और हमारी जीडीपी लगातार स्थिर रही है।
भारत ने अमेरिका की तरफ से पारस्परिक टैरिफ लगाने के एलान से पहले कुछ नीतियां बदली हैं। ऐसे में भारत जवाबी कार्रवाई की जगह, अमेरिका से बातचीत कर समझौते की कोशिश करेगा, ताकि हमारे उद्योगों पर प्रभाव तो भले ही पड़े, लेकिन ज्यादा असर न हो।
दूसरी तरफ एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा के मुताबिक, अमेरिका की तरफ से 26 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के फैसले से दोनों देशों के 30-33 अरब डॉलर के व्यापार पर असर पड़ सकता है। यह जीडीपी पर 0.8 फीसदी से 0.9 फीसदी का प्रभाव पैदा कर सकता है। हालांकि, भारत पर पड़ने वाला प्रभाव एशिया के बाकी देशों पर टैरिफ के असर से कम ही रहेगा। अरोड़ा के मुताबिक, अमेरिका खुद अपने आयात शुल्क लगाने के फैसले का दंश झेलेगा और उसके यहां उपभोक्ता मूल्य इस फैसले के लागू होते ही 1.5% तक बढ़ सकता है। इतना ही नहीं अमेरिकी अर्थव्यवस्था के महंगाई के चलते ठहरने के आसार भी हैं।