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अब देश में ही बनेंगी एमआरआई मशीनें, चार गुना तेजी से करती है स्कैन

Fri, 08 Jun 2018 10:46 AM IST
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 08 Jun 2018 10:46 AM IST
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tata trust makes first indian mri machine, will take scanning in 4 times faster

टाटा ट्रस्ट फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड सोशल एंटरप्रेन्योरशिप (एफआईएसई) ने एक ऐसी हाईटेक पोर्टेबल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) स्कैनर विकसित करने में सफलता पाई है, जो न सिर्फ वजन में हल्की है, बल्कि इसमें बिजली की खपत भी कम होती है और परिणाम भी बेहतर है। इसे देश में ही बनाया जाएगा। अभी तक इस तरह की मशीनों का शत प्रतिशत आयात होता है। यह मशीन परंपरागत मशीन की तुलना में तीन से चार गुना तेजी से स्कैन भी करती है।

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24 महीने में मिली सफलता
टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष रतन टाटा ने बृहस्पतिवार को यहां जारी एक बयान में इसकी घोषणा की। उन्होंने कहा कि मैं बहुत खुश हूं कि हमारी एमआरआई प्रोजेक्ट टीम ने इस खूबी का प्रदर्शन किया है। नए प्रतिभाशाली आविष्कारकों को कारोबारी जोखिम लेने के लिए प्रोत्साहित करने तथा सकारात्मक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव उत्पन्न करने के लिए एक सक्षम इको सिस्टम बनाने की जरूरत है।
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टाटा ट्रस्ट की इस टीम ने सिर्फ 24 महीने में इसे विकसित करने में सफलता पाई है। टाटा ट्रस्ट के प्रवक्ता ने बताया कि अभी यह मशीन परीक्षण और निर्माण के स्तर पर है। इसे अगले वर्ष तक बाजार में लाने की योजना है।  
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ट्रक पर हो सकती है फिट
उनका कहना है कि इस मशीन को एक ट्रक पर भी फिट किया जा सकता है, ताकि इसे देश के ग्रामीण, दूर-दराज के इलाके और कस्बों या छोटे शहरों में भी ले जाया जा सके। इसके लिए ट्रक के चेसिस पर विशेष रूप से बनाया गया कंटेनर लगाना पड़ता है, ताकि मशीन के मैग्नेटिक फील्ड से ट्रक या बाहर की चीजों को नुकसान न पहुंचे। 

आधी कीमत पर होगी एमआरआई 

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एफआईएसई की टीम के एक सदस्य ने अमर उजाला को बताया कि इस मशीन से एमआरआई स्कैनिंग की लागत आधी रह जाएगी। उल्लेखनीय है कि इस समय 1.5 टेस्ला होल बॉडी एमआरआई के लिए मरीजों को आठ से 10,000 रुपये  चुकाने पड़ते हैं। मतलब, इसके बाजार में आ जाने पर चार-पांच हजार रुपये या इससे भी कम खर्च में यह जांच संभव हो सकेगा। 

मौजूदा स्कैनर्स हैं महंगे 
इस समय 1.5 टी क्षमता वाले स्कैनर्स विदेशों से मंगाये जाते हैं और इसकी कीमत डेढ़ से तीन लाख अमेरिकी डॉलर पड़ती है। हालांकि टाटा ट्रस्ट ने इसकी कीमत अभी तय नहीं की है लेकिन उनका कहना है कि आयातित मशीनों के मुकाबले यह काफी सस्ती होगी। इसके अलावा आयातित मशीनें बेहद भारी होती हैं जबकि देश में ही विकसित मशीन इसके मुकाबले बेहद हल्की हैं।  
  
पहला परीक्षण श्री सत्य साईं इंस्टीट्यूट में 
इस मशीन को विकसित करने में बंगलूरू के श्री सत्य साईं इंस्टीट्यूट ऑफ हायर मेडिकल साइंसेज ने क्लिनिकल पार्टनर की भूमिका निभाई है। इस मशीन को सबसे पहले वहीं लगाया गया था।  

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