Tariff War: वैश्विक मामलों में पहले भी हो चुकी है ये चूक; अमेरिका पूर्व में भी दिखा चुका है पीठ, जानिए सबकुछ
भारतीयों का डीएनए 'दिल से सोचने और दिल से रिश्ते निभाने वाला' है। यह बात सामान्य भारतीय से लेकर प्रधानमंत्री तक सब पर लागू होती है। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि दुनिया भावनात्मक संबंध नहीं, बल्कि व्यापार और भू राजनीतिक कूटनीती की भाषा समझती है। अमेरिका के साथ टैरिफ प्रकरण से इस बात का क्या संबंध है, आइए समझते हैं विस्तार से।
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विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती कभी मीडिया की पहली हेडलाइन होती थी, लेकिन ट्रंप ने अपनी इस दोस्ती को किनारे रखते हुए भारतीय वस्तुओं के आयात पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया है। इसके पूर्व की बातचीत में ट्रंप ने भारत को एक महत्त्वपूर्ण सहयोगी और मोदी को अपना अच्छा दोस्त भी बताया था, लेकिन इसके बाद भी टैरिफ लगाने के मामले में उन्होंने भारत को कोई छूट नहीं दी। उलटे भारत ब्राजील के साथ सबसे अधिक टैरिफ झेलने वाले देशों की सूची में सबसे ऊपर है। केवल रूस से व्यापार करने के कारण भारत पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया है। क्या मोदी की 'अमेरिका नीति' में कोई चूक हुई है? कुछ समय पहले तक जो अमेरिका भारत के काफी करीब आता दिख रहा था, वह अचानक दूर क्यों हो गया?
प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ भी खूब दोस्ती आगे बढ़ाई थी। वे उन्हें अपने गृहराज्य गुजरात के दौरे पर ले गए और उनके साथ व्यक्तिगत तौर पर करीबी संबंध स्थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन दोनों नेताओं की गर्म मुलाकात के बाद भी भारत-चीन के बीच डोकलाम में विवाद हुआ और लंबे समय तक यह दोनों देशों के बीच संघर्ष का कारण बना रहा। इसमें दोनों ही देशों को अपने सैनिकों को खोना पड़ा। चीन से पहले केंद्र में अपनी सत्ता स्थापित करने के कुछ समय बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ भी दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया था। वे पाकिस्तान के साथ मजबूत और अच्छा संबंध स्थापित कर दोनों देशों के रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते थे, लेकिन इसके बदले भारत को पुलवामा और पहलगाम जैसी आतंकी घटनाएं देखने को मिलीं।
अमेरिका, चीन और पाकिस्तान के इन मामलों में प्रधानमंत्री मोदी ने आगे बढ़कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया और व्यक्तिगत संबंध स्थापित कर भारत को मजबूत बनाने का लक्ष्य बनाया था। उनका यह लक्ष्य 'सबका साथ और सबका विश्वास' के उनके सिद्धांत के अनुरूप ही था, लेकिन बाद के हालातों को देखते हुए माना जा सकता है कि उनके प्रयास बहुत सफल नहीं रहे। इसका कारण क्या है?
'भावनात्मक संबंध नहीं, व्यापार की भाषा समझती है दुनिया'
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. परमवीर सिंह ने अमर उजाला से कहा कि भारतीयों का डीएनए 'दिल से सोचने और दिल से रिश्ते निभाने वाला' है। यह बात सामान्य भारतीय से लेकर प्रधानमंत्री तक सब पर लागू होती है। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि दुनिया भावनात्मक संबंध नहीं, बल्कि व्यापार और भू राजनीतिक कूटनीती की भाषा समझती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्तर पर सभी देशों के साथ भारत के संबंध मजबूत बनाने की कोशिश की। लेकिन इन देशों की राजनीति ने मोदी को उनका अपेक्षित लाभ नहीं लेने दिया।
डॉ. परमवीर सिंह ने कहा कि भारत से यह गलती कोई पहली बार नहीं हुई है। देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर मोदी तक कई प्रधानमंत्री इस सोच के शिकार हुए कि उनके व्यक्तिगत संबंध देशों के बीच के संबंधों को गहराई दे सकते हैं। प्रधानमंत्री नेहरू भी इसी गलतफहमी का शिकार हुए थे। उन्हें लगता था कि चीन उनके व्यक्तिगत संबंधों की कद्र करेगा और भारत की सीमा का अतिक्रमण नहीं करेगा, लेकिन इसके बदले चीन ने भारत को धोखा दिया। भारत-चीन युद्ध में देश को अनगिनत सैनिकों के प्राणों के साथ-साथ हजारों वर्ग मील जमीन भी खोनी पड़ी।
इंदिरा और अटल ने भी किये थे प्रयास
उनके अनुसार, देश की सबसे मजबूत प्रधानमंत्री मानी जाने वाली इंदिरा गांधी भी अमेरिका के साथ अपने संबंधों को लेकर गलतफहमी का शिकार हुईं। उन्होंने अमेरिका से भारत के संबंधों को मजबूत बनाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास किए थे। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन से उनके व्यक्तिगत स्तर पर बहुत अच्छे संबंध थे। इंदिरा गांधी यह मानकर चल रही थीं कि उनके संबंधों के कारण पाकिस्तान से तनाव के समय अमेरिका उसका साथ नहीं देगा। लेकिन हुआ उलटा। रोनाल्ड रीगन ने इंदिरा से अपने अच्छे संबंधों के स्थान पर पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्तों को ज्यादा महत्त्व दिया और भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान की हर स्तर पर मदद की। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी ने भी पाकिस्तान के साथ संबंध बनाने की खूब कोशिश की थी। उनकी लाहौर बस यात्रा भारत की कूटनीति में एक इतिहास के रूप में दर्ज है, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के अच्छे प्रयासों के बाद भी अंततः देश को कारगिल युद्ध झेलना पड़ा। इसमें अंतिम विजय तो भारत की हुई, लेकिन भारत को अपने कई सैनिकों की जान गंवानी पड़ी। वाजपेयी इस धोखे को कभी स्वीकार नहीं कर पाए।
अमेरिका के लिए पाकिस्तान महत्त्वपूर्ण क्यों
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. शिवानी सिंह ने अमर उजाला से कहा कि हमें यह समझना पड़ेगा कि अमेरिका के लिए कई मायनों में भारत से ज्यादा महत्त्वपूर्ण सहयोगी पाकिस्तान है और यही कारण है कि वह उसकी कई गलतियों को भूलकर भी उसके साथ दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाता रहा है। अमेरिका जानता है कि भारत अमेरिका को कभी अपना सैन्य बेस इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देगा, जबकि ईरान-चीन के साथ-साथ अफगानिस्तान में किसी बड़े राजनीतिक संकट के समय उसे इसकी बहुत आवश्यकता होगी। अमेरिका की यह आवश्यकता केवल पाकिस्तान ही पूरी कर सकता है। चीन जिस तरह पाकिस्तान में अपनी दखल बढ़ाता जा रहा है, अमेरिका के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने पुराने सहयोगी को अपने खेमे में खींचे। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बीच भी अमेरिका के लिए यह आवश्यक हो गया कि वह पाकिस्तान को अपने पक्ष में बनाकर रखे। ऐसे में पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के झुकाव को उसकी रणनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसे भारत की कीमत पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह अमेरिका की अपनी आवश्यकताओं का परिणाम है।
डॉ. शिवानी सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बराक ओबामा के समय से ही भारत के अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत बनाने में जुटे रहे हैं। लेकिन ट्रंप की राजनीतिक मजबूरी यह है कि वे अमेरिका को जो बाइडेन के कार्यकाल से बेहतर आर्थिक स्थिति में लाकर यह संकेत देना चाहते हैें कि उनके शासनकाल में अमेरिका हर तरह से समृद्ध हुआ है, जबकि बाइडेन ने देश को कमजोर करने का काम किया। यह अमेरिकी राजनीति में उनकी पकड़ को और मजबूत करेगा।
विकसित थिंक टैंक बनाना भारत की आवश्यकता
डॉ. परमवीर सिंह ने कहा कि विदेशों से संबंधों के मामले में भारत के पास ज्यादा सशक्त संसाधन नहीं हैं। भारत के पास ऐसे वैज्ञानिक थिंक टैंकों का काफी अभाव है जो किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित हुए बिना किसी देश के साथ भारत के संबंधों का गहरा और लंबा अध्ययन कर सरकारों को उचित सलाह दे सकें। इस समय के भारत के थिंक टैंक बहुत ज्यादा समृद्ध और सशक्त नहीं हैं। यही कारण है कि वे अपना असर छोड़ने में नाकाम रहे हैं।
जबकि अमेरिका और यूरोपीय देशों में एक-एक देश के साथ संबंधों का गहराई के साथ अध्ययन करने के लिए कई-कई थिंक टैंक होते हैं। वे अपने देश की सरकारों को बहुमूल्य सुझाव देते हैं, जिससे उनके संबंध ज्यादा गहराई से बनते हैं। भारत को भी महत्त्वपूर्ण देशों के साथ संबंधों का अध्ययन करने वाले बड़े थिंक टैंक बनाने चाहिए। इससे भारत नेहरू से लेकर मोदी तक के समय में हुई 'गलतियों' से बच सकेगा।