रिपोर्ट: कर्ज घटा पर वसूली में रिकॉर्ड सुधार, 1% पर आया 90 दिनों से अधिक का एनपीए; जानिए सिबिल ने क्या बताया
क्रेडिट ब्यूरो ट्रांसयूनियन सिबिल और सा-धन की 'रेसिलिएंट रिकवरी' रिपोर्ट के अनुसार, 3.3 लाख करोड़ रुपये के सूक्ष्म वित्त क्षेत्र में एनपीए घटकर 1.0% रह गया है। जानिए जिम्मेदार ऋण वितरण, एनबीएफसी-एमएफआई की बढ़ती हिस्सेदारी और विशेषज्ञों की राय। पूरी खबर पढ़ें।
विस्तार
देश का सूक्ष्म वित्त (माइक्रोफाइनेंस) क्षेत्र इस समय एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ जहां कुल ऋण पोर्टफोलियो में हल्की गिरावट देखी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कर्ज चुकाने की स्थिति और एसेट क्वालिटी में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। ट्रांसयूनियन सिबिल और सा-धन की ओर से जारी संयुक्त रिपोर्ट 'रेसिलिएंट रिकवरी' के अनुसार, उद्योग में सख्त मूल्यांकन मानकों और जिम्मेदार ऋण वितरण का पालन करने से यह सकारात्मक बदलाव संभव हुआ है।
सूक्ष्म वित्त क्षेत्र के पोर्टफोलियो और क्रेडिट आपूर्ति की वर्तमान स्थिति क्या है?
अक्टूबर 2026 में जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 के अंत तक भारत का कुल सूक्ष्म वित्त ऋण पोर्टफोलियो*3.3 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया है।
- वार्षिक गिरावट: पिछले वर्ष की तुलना में कुल पोर्टफोलियो में 6 प्रतिशत की वार्षिक गिरावट आई है, जबकि सक्रिय कर्जदारों की संख्या में 17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
- नए उपायों का असर: सेल्फ-रेगुलेटरी ऑर्गनाइजेशन की ओर से लागू किए गए नए दिशानिर्देशों के तहत दो से अधिक लेंडर्स वाले या एक लाख रुपये से अधिक के बकाए वाले कर्जदारों को अतिरिक्त लोन देने पर नियंत्रण लगाया गया है। इससे अत्यधिक कर्ज पर रोक लगी है।
एसेट क्वालिटी और लोन चुकाने की स्थिति में कितना सुधार आया है?
रिपोर्ट दर्शाती है कि कड़े क्रेडिट मानकों का सीधा असर पोर्टफोलियो की सेहत पर सकारात्मक रूप में दिखा है।
- एनपीए (90+ DPD) में भारी कमी: 90 दिनों से अधिक की डिफ़ॉल्ट दर (90+ DPD) जून 2025 के 3.6 प्रतिशत से गिरकर जून 2026 में मात्र 1.0 प्रतिशत पर आ गई है।
- पीएआर दर में सुधार: 1 से 180 दिनों का पोर्टफोलियो एट रिस्क पिछले वर्ष के 6.3 प्रतिशत से सुधरकर 1.9 प्रतिशत रह गया है।
- शुरुआती डिफॉल्ट में गिरावट: लोन जारी होने के शुरुआती 6 महीनों में होने वाला डिफॉल्ट दिसंबर 2024 के 3.2 प्रतिशत से घटकर दिसंबर 2025 में महज 0.8 प्रतिशत पर आ गया है।
बाजार में लेंडर्स की हिस्सेदारी और क्षेत्रीय भूगोल में क्या बदलाव हुए हैं?
सूक्ष्म वित्त बाजार के लेंडिंग पैटर्न में संरचनात्मक बदलाव देखे जा रहे हैं।
- एनबीएफसी-एमएफआई का वर्चस्व: जून 2019 में जहां बैंकों के पास 42 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, वहीं जून 2026 में बैंकों की हिस्सेदारी घटकर 27 प्रतिशत रह गई है। इसके विपरीत, एनबीएफसी-एमएफआई की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत से बढ़कर 43 प्रतिशत हो गई है, जिससे वे बाजार के सबसे बड़े प्रदाता बन गए हैं। एनबीएफसी की हिस्सेदारी भी बढ़कर 15 प्रतिशत पर पहुंच गई है।
- उत्तरी राज्यों में विस्तार: क्रेडिट वितरण अब दक्षिणी राज्यों की बजाय उत्तरी भारत की ओर स्थानांतरित हुआ है। जून 2026 में कुल लोन वितरण में बिहार की हिस्सेदारी 17 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत दर्ज की गई।
- उत्पादों का विविधीकरण: लगभग 18 प्रतिशत माइक्रोफाइनेंस कर्जदार अब गोल्ड लोन, हाउसिंग और प्रॉपर्टी लोन जैसे गैर-सूक्ष्म वित्त उत्पादों का भी उपयोग कर रहे हैं।
सतत विकास और जिम्मेदार ऋण वितरण पर विशेषज्ञों की क्या राय है?
भारत फाइनेंशियल इन्क्लूजन लिमिटेड (बीएफआईएल) के प्रबंध निदेशक व सीईओ तपोब्रत चौधरी के अनुसार, पुनर्भुगतान में सुधार उद्योग के लिए एक बेहद सकारात्मक संकेत है। उन्होंने कहा कि आगे की वृद्धि के लिए कंपनियों को विवेकपूर्ण ऋण मूल्यांकन, जिम्मेदार वितरण और ग्राहकों की चुकाने की क्षमता को प्राथमिकता देनी होगी। जो संस्थान वृद्धि, पोर्टफोलियो गुणवत्ता और कर्जदारों के हितों के बीच संतुलन बनाएंगे, वे ही दीर्घकालिक मूल्य सृजित कर सकेंगे। वहीं, सा-धन के कार्यकारी निदेशक व सीईओ जीजी मामेन का मानना है कि क्रेडिट अनुशासन और परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार को बनाए रखना इस क्षेत्र के टिकाऊ विकास के लिए अनिवार्य है।
सूक्ष्म वित्त क्षेत्र ने हालिया तनाव के दौर से उबरकर स्थिरता हासिल कर ली है। अब चुनौती इस बात की है कि बेहतर एसेट क्वालिटी और मजबूत डेटा एनालिटिक्स के आधार पर जरूरतमंद महिलाओं और छोटे उद्यमियों तक पारदर्शी व जिम्मेदार तरीके से लोन की पहुंच कैसे बढ़ाई जाए। अनुशासन और नियामक नियमों का कठोरता से पालन ही इस सेक्टर के दीर्घकालिक पुनरुद्धार की कुंजी साबित होगा।