तेल का खेल: मध्यप्रदेश के बालाघाट में पेट्रोल न्यूयॉर्क से दोगुना महंगा, पांच बिंदुओं में जानें इसके सस्ता न होने की वजह
अगर डॉलर को रुपये में बदलें तो इस वक्त न्यूयॉर्क में एक लीटर पेट्रोल यानी गैसोलीन 60 से 62 रुपये में मिल रहा है। इस तरह बालाघाट में पेट्रोल न्यूयॉर्क के मुकाबले करीब दोगुना महंगा है।
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पेट्रोल के भाव सारे रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। मध्यप्रदेश के बालाघाट में शनिवार (17 जुलाई) को लोगों ने एक लीटर पेट्रोल 112 रुपये से ज्यादा चुकाकर खरीदा। अगर डॉलर को रुपये में बदलें तो इस वक्त न्यूयॉर्क में एक लीटर पेट्रोल यानी गैसोलीन 60 से 62 रुपये में मिल रहा है। इस तरह बालाघाट में पेट्रोल न्यूयॉर्क के मुकाबले करीब दोगुना महंगा है। यहां तक कि पाकिस्तान में भी हमसे आधे दाम पर पेट्रोल बिक रहा है। गौरतलब है कि भारत में पेट्रोल-डीजल की ज्यादा कीमतों के लिए ये पांच वजहें जिम्मेदार हैं। आइए, इनके बारे में बारी-बारी से जानते हैं...
1. ऐसे ढाई गुना महंगा हो रहा पेट्रोल
अगर दिल्ली की बात करें तो एक लीटर पेट्रोल पर केंद्र सरकार 33-34 फीसदी उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकार 23 फीसदी तक वैट वसूलती है। डीजल पर केंद्र सरकार 35.66 फीसदी और राज्य सरकार 14.62 फीसदी टैक्स वसूलती है। यानी पेट्रोल की कीमतों में 55 फीसदी और डीजल की कीमतों में 50 फीसदी तो टैक्स ही शामिल है। पेट्रोल पर कितना टैक्स लग रहा है और आप तक पहुंचते-पहुंचते यह कितना महंगा हो जाता है, इसे दिल्ली के उदाहण से समझिए...

2. पेट्रोल-डीजल पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की मोटी कमाई
बीते छह साल में मोदी सरकार की पेट्रोल-डीजल से कमाई 307 फीसदी तक बढ़ी है। अगर पेट्रोल-डीजल पर एक रुपये का उत्पाद शुल्क भी बढ़ता है तो सरकार की सालाना कमाई 14 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ जाती है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पेट्रोलियम उत्पादों पर वैट से राज्य सरकारों ने 2019-20 में 2 लाख करोड़ रुपये और अप्रैल-दिसंबर 2020-21 में 1.35 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कमाई की। वहीं, केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क से 2019-20 में 2.39 लाख करोड़ रुपये और 2020-21 में 3.89 लाख करोड़ रुपये का राजस्व कमाया।
3. तेल कंपनियां बार-बार बढ़ा रहीं दाम
तेल कंपनियां रोज पेट्रोल-डीजल की कीमतें तय करती हैं। इस साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद 4 मई से कीमतें बढ़ना शुरू हुईं। अब तक कीमतों में 41 बार इजाफे की वजह से पेट्रोल करीब 11.5 रुपये तक महंगा हो चुका है। डीजल के दाम भी बीते 75 दिनों में 37 बार बढ़े हैं और यह 9.14 रुपये तक महंगा हो गया है।
4. आयात पर खर्च ज्यादा
इस पर भारत की निर्भरता कितनी है, इसे इसी आंकड़े से समझा जा सकता है कि देश ने अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 के बीच 1.50 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल आयात किया था। कच्चे तेल की कीमतें पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन ओपेक तय करता है। यह संगठन 1960 में बना था। 13 देश इसके सदस्य हैं। दुनिया की जरूरतों का 40 फीसदी कच्चा तेल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात मुहैया कराते हैं।
5. इंडियन बास्केट की वजह से कीमत में फर्क
भारत को जिस कीमत पर कच्चा तेल मिलता है, उसे इंडियन क्रूड बास्केट कहते हैं। दरअसल, कच्चा तेल दो तरह का होता है। सोर क्रूड और स्वीट क्रूड। जिस कच्चे तेल में सल्फर ज्यादा हो, उसे सोर क्रूड कहते हैं। वहीं, कम मात्रा में सल्फर वाले कच्चे तेल को स्वीट ग्रेड कहते हैं।
ओमान और दुबई से आने वाला कच्चा तेल सोर ग्रेड का होता है। इंडियन क्रूड बास्केट की गणना में इस तेल का वेटेज 68.2 फीसदी है। इस तेल की प्रोसेसिंग पर ज्यादा खर्च आता है। बाकी तेल का वेटेज 31.8 फीसदी है। इसी आधार पर इंडियन क्रूड बास्केट तय की जाती है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत भले ही कम हो, इंडियन बास्केट में कीमत कुछ ज्यादा हो सकती है। इसे ऐसे समझिए कि अप्रैल 2020 में दुनियाभर में लॉकडाउन की वजह से कच्चे तेल की कीमत 9.12 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई थी, तब इंडियन बास्केट में यह कीमत 19.90 डॉलर प्रति बैरल पर थी।