पेट्रोल-डीजल : फिर हो सकते हैं महंगे, विशेषज्ञों का दावा- अगले साल मार्च के बाद ही मिलेगी राहत
विशेषज्ञों का दावा है कि ओपेक देशों की ओर से दिसंबर 2021 से कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाए जाने पर ही राहत मिलेगी। भारत अपनी जरूरतों का 86 फीसदी कच्चे तेल का आयात करता है।
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पेट्रोल और डीजल की महंगाई से परेशान लोगों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने दिवाली से एक दिन पहले पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क में कटौती की। इसके बाद कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने भी वैट में कमी कर दी, जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें 12 रुपये प्रति लीटर तक कम हो गईं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में पेट्रोल और डीजल के दाम फिर बढ़ सकते हैं। अगले साल मार्च के बाद ही लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है।
ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा का कहना है कि भारत अपनी जरूरतों का 86 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। इसकी कीमतें किसी सरकार के हाथ में नहीं हैं क्योंकि पेट्रोल और डीजल नियंत्रण के दायरे से बाहर है। जुलाई, 2010 में मनमोहन सिंह की सरकार ने पेट्रोल को नियंत्रण मुक्त किया था, जबकि 2014 में मोदी सरकार ने डीजल को भी नियंत्रण के दायरे से बाहर कर दिया। इसके अलावा, वैश्विक बाजार में तेल के दाम बढ़ने की मुख्य वजह कोरोना महामारी भी है।
वहीं, केडिया एडवाइजरी के निदेशक अजय केडिया का कहना है कि उत्पाद शुल्क में कटौती के बावजूद लोगों को फिलहाल ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। इसकी प्रमुख वजह वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम में लगातार बढ़ोतरी होना है, जो आने वाले समय में और बढ़कर 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि ओपेक देश इस साल दिसंबर से कच्चे तेल का उत्पादन प्रतिदिन 40 लाख बैरल बढ़ाने पर राजी हुए हैं। इसके बाद कीमतें घटकर 68-70 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं। ऐसे में मार्च, 2022 के बाद ही लोगों को पेट्रोल और डीजल की महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद है।
2023 तक 100 डॉलर पहुंचने का अनुमान
तनेजा ने कहा कि जब भी मांग और आपूर्ति में असंतुलन होता है, कीमतों में वृद्धि होना तय है। इसके अलावा, दुनियाभर की सरकारों का सौर और हरित ऊर्जा पर जोर देने के कारण तेल क्षेत्र में निवेश की कमी है। इस कारण 2023 तक कच्चा तेल बढ़कर 100 डॉलर तक पहुंच सकता है। अभी ब्रेट क्रूड 80.54 डॉलर प्रति बैरल है, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड 78.81 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। पिछले सप्ताह यह 85 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया था, जो 2014 के बाद से इसका उच्चतम स्तर है।
...इसलिए घटाया उत्पाद शुल्क
उत्पाद शुल्क में कटौती पर तनेजा ने कहा कि जब तेल की कीमतें कम होती हैं तो सरकार उत्पाद शुल्क बढ़ाती है। इसी तरह, जब तेल बहुत महंगा होता है तो सरकार इसमें कटौती करती है। कोरोना काल में तेल की खपत और बिक्री में 40 फीसदी तक कमी आई थी। बिक्री कम होने पर सरकार की कमाई अपने आप घट जाती है। लेकिन, अब तेल की बिक्री कोरोना पूर्व स्तर पर वापस आ गई है।
इन वजहों से फिलहाल राहत संभव नहीं
- अजय केडिया का कहना है कि महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की मांग 100 फीसदी पर पहुंच गई है, जबकि आपूर्ति कम हो रही है।
- डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। इससे कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों को समर्थन मिल रहा है।
- चीन में कोयला और यूरोप में गैस का संकट है, जिससे इन देशों में कच्चे तेल की मांग बढ़ी है।
- डेढ़ साल में तेल उत्पादक देशों का काफी नुकसान हुआ है। ऐसे में वे फिलहाल उत्पादन नहीं बढ़ाकर इसकी भरपाई कर रहे हैं।
7 साल में डीजल पर 512 फीसदी बढ़ा उत्पाद शुल्क
दिवाली से एक दिन पहले कटौती के बावजूद सात वर्षों में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क क्रमश: 194 फीसदी एवं 512 फीसदी बढ़ा है। 2014 में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 9.48 रुपये प्रति लीटर था, जो अब 194.30 फीसदी बढ़कर 27.90 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। इसी प्रकार, डीजल पर यह शुल्क 3.56 रुपये प्रति लीटर से 512.35 फीसदी बढ़कर 21.80 फीसदी पहुंच गया है। इस कटौती से पहले केंद्र सरकार ने मार्च से मई, 2020 के बीच पेट्रोल पर 13 रुपये और डीजल पर 16 रुपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क बढ़ाया था।
| वर्ष | पेट्रोल | डीजल |
| 2014 | 9.48 | 3.56 |
| 2015 | 19.36 | 11.83 |
| 2020 | 32.90 | 31.80 |
| अब | 27.90 | 21.80 |
चार साल में 40.69 रुपये तक बढ़े दाम
| अवधि | पेट्रोल | डीजल |
| 1 नवंबर, 2017 | 69.14 | 57.73 |
| 1 नवंबर, 2018 | 79.37 | 73.78 |
| 1 नवंबर, 2019 | 72.86 | 65.80 |
| 1 नवंबर, 2020 | 81.06 | 70.46 |
| 1 नवंबर, 2021 | 109.69 | 98.42 |