स्वतंत्रता दिवस विशेष: जानिए आजादी से अब तक के शीर्ष औद्योगिक घराने कौन से रहे? कुछ आगे बढ़े, कुछ बर्बाद हुए
पिछले सात दशकों में देश की कुछ कंपनियां ऐसी रहीं जिनको कामयाबी मिली और इन्होंने विदेश में भी अपनी पहचान बनाई। वहीं कुछ कंपनियों को भारी कर्ज या घाटे की वजह से अपना कारोबार बंद करना पड़ा।
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विस्तार
देश आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इन सात दशकों में भारत ने औद्योगिक क्षेत्र में काफी विकास किया है। कुछ कंपनियां ऐसी रहीं, जिनकी विदेश में भी पहचान बनी। एक समय में भारतीय कंपनियों को विदेश में ज्यादा इज्जत नहीं मिलती थी, लेकिन कुछ कंपनियों ने विदेश में भी सफलता के झंडे गाड़कर देश का नाम रोशन किया। वहीं, कुछ कंपनियां आज भारी कर्ज या घाटे के कारण संकट के दौर से गुजर रही हैं और कुछ कंपनियों को अपना कारोबार भी समेटना पड़ा है। सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं कि कौन-सी कंपनियां कामयाब रहीं और कौन-सी कंपनियों को नाकामी हाथ लगी...
इन भारतीय कंपनियों को कामयाबी मिली-
1. रिलायंस इंडस्ट्रीज (मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली)
शुरुआत: वर्ष 1973
मौजूदा मार्केट कैप: 13,59,652.06 करोड़ रुपये
मुकेश अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी ने 1960 के दशक में रिलायंस की शुरुआत की। साल 2005 में जब धीरूभाई के 28,000 करोड़ रुपये के रिलायंस ग्रुप का बंटवारा हुआ था, तब मुनाफा कमाने वाला टेलीकॉम सेक्टर मुकेश अंबानी के भाई अनिल अंबानी को मिला। साथ ही यह निर्णय लिया गया कि आगामी 10 वर्षों तक बड़े भाई मुकेश इस क्षेत्र में दखल नहीं देंगे। हालांकि, वक्त बीतने के साथ-साथ मुकेश अंबानी की नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) अनिल अंबानी समूह से आगे निकल गई। इसकी स्थापना वर्ष 1973 में हुई थी।
तेल, रिटेल और जियो
13,59,652.06 करोड़ रुपये के बाजार पूंजीकरण के साथ मुकेश अंबानी की RIL आज देश की सबसे बड़ी कंपनी है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास दुनिया की प्राइवेट सेक्टर की सबसे बड़ी ऑयल रिफाइनरी है। यह गुजरात के जामनगर में है। फोर्ब्स के अनुसार, मुकेश अंबानी की रियल टाइम नेटवर्थ 81.8 अरब डॉलर है। पिछले कुछ सालों में रिलायंस ने तेजी से तरक्की की है और एक कर्जमुक्त कंपनी हो गई है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास तीन ग्रोथ इंजन हैं- ऑयल, रिटेल और जियो।
हाल ही में रिलायंस आठ साल बाद 'फॉर्च्यून ग्लोबल 500' सूची में शीर्ष-100 कंपनियों में जगह बनाने में भी कामयाब रही। फॉर्च्यून पत्रिका की 2020 की वैश्विक कंपनियों की सूची में आरआईएल 10 स्थानों की छलांग लगाकर 96वें स्थान पर है। 2019-20 में 86.2 अरब डॉलर कमाई करने वाली आरआईएल इस सूची में शामिल एकमात्र भारतीय कंपनी है।
2. टाटा ग्रुप
शुरुआत: वर्ष 1868
टीसीएस का मौजूदा मार्केट कैप:12,80,574.59 करोड़ रुपये
टाटा समूह भारत के सबसे बड़े और पुराने समूहों में शुमार है। टाटा स्टील और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) जैसी दिग्गज कंपनियां इस समूह में शामिल हैं। सिर्फ आईटी क्षेत्र ही नहीं, शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें टाटा की किसी न किसी तरह से भूमिका न हो। टाटा कंपनी नमक से लेकर वाहन बनाने के लिए जानी जाती है। जैसे-जैसे भारत का तकनीकी परिदृश्य बढ़ रहा है, टीसीएस भी लगातार विस्तार कर रही है।
2006 में कोरस का 12.7 अरब डॉलर में अधिग्रहण करके टाटा स्टील ने ब्रिटेन में कदम रखा था। यह उस वक्त किसी भी भारतीय कंपनी द्वारा किया गया यह सबसे बड़ा अधिग्रहण था। इसके बाद टाटा मोटर्स ने मार्च 2006 में जैगुआर और लैंड रोवर का 2.3 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था। 2012 में टाटा समूह की अन्य कंपनी इंडियन होटल कंपनी ने अक्तूबर 2012 में ओरिएंट होटल का 1.67 अरब डॉलर में अधिग्रहण किया था। आज टीसीएस का बाजार पूंजीकरण 12,80,574.59 करोड़ रुपये है।
3. ओएनजीसी
शुरुआत: 14 अगस्त 1956
मौजूदा मार्केट कैप: 1,46,057.04 करोड़ रुपये
महारत्नों में शामिल सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल एंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी) आज देश में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सबसे बड़ी कंपनी है। ओएनजीसी के पास तेल और गैस के अन्वेषण और उत्पादन तथा संबंधित तेल फील्ड सेवाओं के सभी क्षेत्रों में आंतरिक सेवा सक्षमताओं वाली एक कंपनी होने की अनोखी विशिष्टता है। कंपनी हर रोज 12.6 लाख बैरल से भी ज्यादा तेल समतुल्य गैस का उत्पादन करती है। यह भारत के घरेलू उत्पादन के लगभग 70 फीसदी का योगदान कर रही है। ओएनजीसी विदेश, भारत की राष्ट्रीय तेल कंपनी ओएनजीसी की एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है। यह भारत की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस कंपनी है। कंपनी को 2017 के लिए विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों की फोर्ब्स वैश्विक 2000 सूची में वैश्विक तेल और गैस प्रचालन उद्योग के बीच 14वां स्थान दिया गया। ओएनजीसी ने 2018 में 'तेल और गैस अन्वेषण' श्रेणी में इन एंड ब्रॉडस्ट्रीट पुरस्कार जीता था। कंपनी की बाजार हैसियत 1,46,057.04 करोड़ रुपये है।
आजादी के बाद बर्बाद हुईं ये भारतीय कंपनियां-
1. किंगफिशर एयरलाइंस
शुरुआत: 2003
कब बंद हुई: 2012
एक समय में भारत के मशहूर कारोबारियों में शुमार विजय माल्या की बर्बादी की कहानी किसी से छिपी नहीं है। साल 2003 में किंगफिशर एयरलाइंस की स्थापना की गई थी। इसका स्वामित्व कई बैंकों से करीब 9,000 करोड़ रुपये का लोन लेकर भागे विजय माल्या की अगुवाई वाले युनाइटेड ब्रिवरीज ग्रुप के पास था। साल 2005 में एयरलाइंस का कमर्शियल ऑपरेशन शुरू हुआ था और कुछ ही समय में यह एविएशन सेक्टर की बड़ी कंपनी बन गई। लेकिन विजय माल्या की किंगफिशर ने अपने कारोबार को 2012 में ही समेट लिया।
तब माल्या ने ट्वीट कर बताया था, 'खराब प्रैट ऐंड व्हिट्नी इंजनों की वजह से किंगफिशर एयरलाइंस ठप हुई है।' उन्होंने मुआवजे के लिए इन इंजनों को तैयार करने वाली कंपनी आईएआई के खिलाफ मुकदमा भी किया था। बंद होने के करीब 10 साल पहले शुरू हुई किंगफिशर लगातार कर्ज में डूब रही थी। 2013 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व में भारतीय बैंकों के एक संघ ने ऋण वापसी के लिए संपर्क किया, जिसका भुगतान नहीं किया गया। आज माल्या को बंद हो चुकी किंगफिशर एयरलाइन द्वारा बकाया ऋण की अदायगी की मांग के लिए दुनिया भर में फ्रीजिंग आदेश का पालन करना पड़ रहा है।
2. रिलायंस कम्युनिकेशंस (अनिल अंबानी समूह)
शुरुआत: 2004
कब बंद हुई: 2019
जहां मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज नई ऊंचाइयां छू रही है, वहीं उनके छोटे भाई अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनियां बंद होने के कगार पर हैं। अनिल अंबानी रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग, रिलायंस, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर और रिलायंस कैपिटल के मालिक हैं। आज ये सभी कंपनियां भारी कर्ज के बोझ तले दबी हैं। साल 2008 में अनिल अंबानी दुनिया के छठवें सबसे अमीर शख्स थे, लेकिन बाद में उन्हें रिलायंस कम्युनिकेशंस के निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया। अनिल अंबानी अरबपतियों के क्लब से भी बाहर हो गए हैं। फोर्ब्स इंडिया की 2007 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार अनिल अंबानी की नेटवर्थ 45 अरब डॉलर थी और उस समय वह देश के तीसरे सबसे बड़े रईस थे। आज अनिल अंबानी की नेटवर्थ जीरो है।
अनिल अंबानी पर फरवरी 2020 तक 30.5 करोड़ डॉलर का कर्ज था, जबकि उनकी असेट्स केवल 8.2 करोड़ डॉलर थी। रिलायंस कम्युनिकेशंस और रिलायंस नैवल एंड इंजीनियरिंग सहित ADAG की कई कंपनियां कर्ज का भुगतान करने में नाकाम रहीं, जिसके बाद बैंकों ने उन्हें बैंकरप्सी कोर्ट में घसीट लिया। रिलायंस कम्युनिकेशन ने कहा था कि उस पर भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों का 26,000 करोड़ रुपये का कर्ज है। अनिल अंबानी की बड़ी कंपनियों में रिलायंस कैपिटल पर दिसंबर 2020 तक 20,380 करोड़ रुपये और रिलायंस होम फाइनेंस पर 13 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था।
3. जेट एयरवेज
शुरुआत: 1993
कब बंद हुई: 2019
1993 में दो विमानों, बोइंग 737 और बोइंग 300 के साथ जेट एयरवेज की लॉन्चिंग हुई थी। 2006 में कंपनी ने करीब 2250 करोड़ रुपये में एयर सहारा को खरीदा था। नवंबर 2013 में एतिहाद एयरलाइस ने जेट के 24 फीसदी शेयर खरीदे थे। तब कंपनी के फाउंडर और चेयरमैन नरेश गोयल के पास 51 फीसदी शेयर थे। चार महीने तक संकट से जूझने के बाद 18 अप्रैल 2019 में जेट एयरवेज की उड़ानें अस्थायी तौर पर बंद हो गई थीं।
जेट एयरवेज के पास दिसंबर 2018 तक 124 विमान थे। जनवरी 2019 से जेट का संकट गहराने लगा था। महज चार महीने में विमानों की संख्या घटकर पांच रह गई थी। गोयल को भी कंपनी से बाहर होना पड़ा। 25 साल पुरानी एयरलाइन कंपनी पर आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज था और बैंकों ने 400 करोड़ रुपये का इमर्जेंसी फंड देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद कंपनी के सामने 'शटरडाउन' के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। हालांकि, जेट एयरवेज अब फिर से उड़ान भरने के लिए तैयार है। हाल ही में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मुंबई बेंच ने कुछ शर्तों के साथ जेट एयरवेज के लिए कालरॉक कैपिटल और मुरारी लाल जालान के रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी दे दी थी।