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गिरती विकास दर के बीच कैसे बनेगी 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था, अपनाने होंगे ये तरीके

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 31 Aug 2019 05:59 PM IST
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भारतीय अर्थव्यवस्था
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देश में अर्थव्यवस्था से जुड़े जो भी आंकड़े सामने आ रहे हैं वह विकास की धीमी चाल की ओर साफ इशारा कर रहे हैं। हाल में औद्योगिक उत्पादन, वाहन बिक्री और वित्तीय संस्थानों के ऋण वितरण में गिरावट आर्थिक संकट की पुष्टि करते हैं। इस स्थिति में सिर्फ इस बात को लेकर खुश नहीं रहा जा सकता है कि भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति के साथ वृद्धि हासिल कर रहा है। 
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इस मामले में हमने अपने पड़ोसी देश चीन को भले ही पछाड़ दिया है लेकिन घरेलू बाजार में मौजूदा हालात ठीक नहीं हैं। ऊंची आर्थिक वृद्धि दर का असर जमीन पर भी दिखना चाहिए जो फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर मंदी की आहट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था करीब सात फीसद की दर से आगे बढ़ रही है जिसे संतोषजनक कहा जा सकता है।

50 खरब डॉलर की इकोनॉमी बनना फिलहाल असंभव

कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग के वाइस प्रेसीडेंट और रिसर्च हेड डा. रवि सिंह ने बताया कि सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने और 2024 तक अर्थव्यवस्था को 50 खरब डॉलर की बनाने जैसे जो लक्ष्य रखे हैं क्या उन्हें हासिल किया जा सकता है? मौजूदा स्थिति में तो यह संभव होता नहीं दिख रहा है। यदि मोदी सरकार को न्यू इंडिया का सपना पूरा करना है तो इसके लिए आर्थिक मोर्चे पर अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। 

करना होगा रणनीति में बदलाव 

आम करदाताओं और निवेशकों पर सिर्फ टैक्स का बोझ बढ़ाने से कोई बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) पर यह फार्मूला लागू करने के परिणाम जगजाहिर हैं। बजट के बाद से विदेशी निवेशक पूंजी बाजार में लगातार बिकवाली करके ज्यादा कमाई के लिए दूसरे देशों में पैसा लगा रहे हैं। 

शेयर बाजार में निवेशकों को नुकसान

शेयर बाजार में गिरावट की मार से पिछले करीब डेढ़ माह में निवेशकों की 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की मेहनत की कमाई डूब चुकी है। दरअसल, सरकार ने बजट में पूंजी बाजार के संदर्भ में जो प्रावधान किए थे वह  मौजूदा परिदृश्य में उचित नहीं थे। उद्योग जगत ने इनके नकारात्मक प्रभावों के बारे में सरकार को अच्छी तरह से अवगत करा दिया था लेकिन इस मुद्दे पर सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं हुई। अब काफी कुछ हाथ से निकल जाने के बाद वह बातचीत को तैयार हुई है। हालांकि इस दिशा में अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है लेकिन निवेशकों के बीच एक सकारात्मक संदेश जरूर गया है। इससे बाजार धारणा में कुछ मजबूती आई है।  

हमेशा इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि जो भी फैसले लिए जाते हैं जरूरी नहीं है कि वह सभी कारगर साबित हों। यदि समय के मुताबिक उनमें बदलाव कर लिया जाए तो इसे अपनी नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए। 
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