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कम आमदनी से कई टेलीकॉम कंपनियां बंद होने की कगार पर
Wed, 03 Apr 2019 04:30 AM IST
गौरव द्विवेदी
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: गौरव द्विवेदी
Updated Wed, 03 Apr 2019 04:30 AM IST
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ऐसे समय में, जब सरकार दूरसंचार क्षेत्र में 5जी सेवा को लांच करने की तैयारी कर रही है, घरेलू बाजार की टेलीकॉम कंपनियां 2जी या 3जी सेवा भी जारी रखने की स्थिति में नहीं है। इन कंपनियों की हालत देखते हुए सेल्यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने सरकार से तुरंत हस्तक्षेप कर उद्योग के अनुकूल कदम उठाने की गुहार लगाई है। हालांकि रिलायंस जियो अन्य कंपनियों से अलग है।
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सीओएआई के महानिदेशक राजन मैथ्यू ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दूरसंचार क्षेत्र की कंपनियों की नकद आमदनी काफी घट गई है। कंपनियों को लाइसेंस फी, स्पैक्ट्रम यूसेज चार्जेज और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए या तो ऋण लेना पड़ रहा है या फिर कोई परिसंपत्ति बेचकर राशि जुटानी पड़ रही है। इन कंपनियों की नकदी आमदनी में गिरावट का अंदाजा इनके ईबीआईटीडीए (अर्निंग बीफोर इंटरेस्ट, टैक्स, डेप्रिसिएशन एंड एमोरटाइजेशन) मार्जिन से मिलता है। तीन-चार साल पहले ही इनका ईबीआईटीडीए मार्जिन 25 से 30 फीसदी था, जो कि अब नकारात्मक हो गया है।
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कई खर्चों की गिनती राजस्व में होती है
मैथ्यू का कहना है कि पहले से तय किये गए तरीके और सरकारी ऋण भुगतान पर जीएसटी वसूली समेत कई मुद्दे अभी सरकार को फिर से निर्धारित करने चाहिए। दूरसंचार कंपनियों के कई ऐसे खर्चे हैं, जिन्हें लेखांकन प्रक्रिया में खर्च के मद में गिना जाना चाहिए। लेकिन उन्हें उसमें न गिनकर राजस्व में गिना जाता है। उदाहरण के लिए हम किसी ग्राहक को यदि हैंडसेट दें, तो उसे जिस कीमत पर दिया जा रहा है, वह राजस्व के मद में गिना जाता है। ग्राहकों को हैंडसेट देने के लिए कंपनी भी उसे कहीं से खरीदती है और उसकी एक कीमत है। इसी तरह यदि कंपनियां सरकार को स्पैक्ट्रम डेट या डिफर्ड स्पैक्ट्रम चार्ज का भुगतान करती हैं, तो इसे सेवा मानते हुए 18 फीसदी जीएसटी वसूली होती है। यह कहां का न्याय है?
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35,000 करोड़ सरकार के पास अटके
सीओएआई के मुताबिक, सरकार टेलीकॉम कंपनियों से विभिन्न मद में जीएसटी वसूलती है और उसे वापस लेने के लिए इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) क्लेम करने को कहती है। लेकिन इन कंपनियों का कारोबार घट गया है, इसलिए न तो आमदनी वैसी हो रही है कि आईटीसी का क्लेम ले सकें। इससे सरकार के पास इन कंपनियों का करीब 35,000 करोड़ रुपये जमा है।
टेलीफोन शुल्क बहुत कम है
मैथ्यू ने कहा कि इस समय भारत में ग्राहकों से दूरसंचार सेवाओं का जो शुल्क लिया जाता है, वह बहुत कम है। इस तरह का शुल्क कहीं देखने को नहीं मिलता। इसलिए इस पर कंपनियों का कामकाज चल पाना मुश्किल है। एमटीएनएल और बीएसएनएल दोनों सरकारी कंपनियां हैं, इसलिए चल जाएंगी। निजी क्षेत्र की कंपनियां इतनी कम आमदनी में कैसे काम करें।