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Tariffs: टैरिफ से कपड़ा निर्यातकों के अस्तित्व पर संकट; तिरुपुर सर्वाधिक प्रभावित, 40 अरब के ऑर्डर रद्द

Wed, 10 Sep 2025 07:13 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो/एजेंसी, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो/एजेंसी, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 10 Sep 2025 07:13 AM IST
सार

 एमके रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले के लगाए गए टैरिफ के कारण कपड़ा उद्योग के मार्जिन में गिरावट आई है। वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे उद्योग के मार्जिन में अतिरिक्त टैरिफ के कारण और गिरावट आएगी।

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America 50 percent tariff increased difficulties of Indian textile industry
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

अमेरिका के 50 फीसदी टैरिफ ने भारतीय कपड़ा उद्योग की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। निर्यातक टैरिफ के असर को झेलने योग्य नहीं हैं। ऐसे में कपड़ा उद्योग को तुरंत प्रोत्साहन की जरूरत है। एमके रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले के लगाए गए टैरिफ के कारण कपड़ा उद्योग के मार्जिन में गिरावट आई है। वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे उद्योग के मार्जिन में अतिरिक्त टैरिफ के कारण और गिरावट आएगी।

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रिपोर्ट के अनुसार, उच्च टैरिफ से कपड़ा उद्योग को अमेरिका से नए ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। पुराने ऑर्डर भी रद्द हो रहे हैं, जिससे इन्वेंट्री बढ़ रही है। ऐसे में उद्योग और खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए सरकारी मदद जरूरी है, क्योंकि बड़े निर्यातकों की तरह इनका खाताबही मजबूत नहीं है। उद्योग को टैरिफ के झटके सहन करने और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में प्रासंगिक बने रहने के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन की जरूरत है। अगर तत्काल जरूरी कदम नहीं उठाए गए, तो न सिर्फ छोटी कंपनियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा, बल्कि बड़ी संख्या में रोजगार भी खत्म होंगे।
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तिरुपुर सर्वाधिक प्रभावित, 40 अरब के ऑर्डर रद्द
देश के निटवियर निर्यात में 55-60 फीसदी हिस्सा रखने वाले तिरुपुर क्लस्टर टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित है। यहां से करीब 700 अरब रुपये के कपड़े का निर्यात होता है। टैरिफ के कारण तिरुपुर को अमेरिका से मिलने वाले करीब 40 अरब रुपये के ऑर्डर रद्द हो गए हैं।

  • भारत का वैश्विक कपड़ा बाजार में करीब चार फीसदी हिस्सा है, जो बांग्लादेश (13 फीसदी) व वियतनाम (9 फीसदी) से काफी कम है।

इन वजहों से भी दबाव

  • अमेरिकी खुदरा विक्रेताओं की ओर से भुगतान में देरी हो रही है।
  • बढ़ती इन्वेंट्री ने घरेलू कंपनियों ने अतिरिक्त दबाव पैदा कर दिया है।
  • एमएसएमई अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बाधाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं।
  • मुक्त व्यापार समझौतों में कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों के कारण इसका पूरा लाभ नहीं मिल रहा है।
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फार्मा कंपनियों को दाम बढ़ाने की होगी जरूरत
टैरिफ के असर से निपटने के लिए भारतीय फार्मा कंपनियों को दवाइयों के दाम बढ़ाने होंगे। इसके साथ ही साइट और बौद्धिक संपदा (आईपी) हस्तांतरण की भी जरूरत है। सिस्टमैटिक्स रिसर्च के अनुसार, टैरिफ अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। कंपनियां अमेरिका में क्षमता बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। दवाइयों की कीमतों में वृद्धि, साइट और आईपी स्थानांतरण, ये तीन उपाय हैं जिनकी उद्योग को टैरिफ से निपटने के लिए जरूरत है। साथ ही, कुछ श्रेणियों खासकर एंटीबायोटिक्स में कच्चे माल की कीमतों में तेजी से सुधार हो रहा है।

  • ग्राहक कम कीमतों का लाभ उठाने के लिए स्टॉक कम कर रहे हैं। कुल मिलाकर, जेनेरिक एपीआई की कीमतें स्थिर हो गई हैं। कंपनियां विकास के नए अवसरों और उत्पाद लॉन्च को लेकर आशान्वित, लेकिन सतर्क भी हैं।
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