जिस बजट का आप कर रहे हैं बेसब्री से इंतजार, संविधान में है ही नहीं उसका जिक्र
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बजट हर व्यक्ति की जिंदगी में एक अहम रोल अदा करता है। बजट के मुताबिक ही सालभर की कार्ययोजना को रफ्तार मिलती है। लेकिन क्या आपको पता है हमारे संविधान में बजट का कहीं जिक्र तक नहीं है। जी हां, जिस बजट के आधार पर आप अपना बजट तय करते हैं, संविधान में उसका कहीं लेखा-जोखा है ही नहीं।
संविधान के अनुच्छेद 112 के अनुसार बजट की जगह वार्षिक वित्तीय विवरण शब्द का इस्तेमाल किया गया है। राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान संसद के दोनों सदनों के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण रखवाते हैं, जिसमें सरकार के गत वर्ष के आय/व्यय का ब्योरा होता है। संविधान के अनुसार, प्रत्येक वर्ष फरवरी के अंतिम कार्य-दिवस में भारत के वित्त मंत्री द्वारा संसद में पेश किया जाता है। भारत के वित्तीय वर्ष की शुरूआत, अर्थात 1 अप्रैल से इसे लागू करने से पहले बजट को सदन द्वारा इसे पारित करना आवश्यक होता है। लेकिन समय के साथ इस वित्तीय विवरण के रूप में सरकार ने काफी बदलाव किए हैं।
वित्त मंत्री अरुण जेटली एक फरवरी 2018 को आम बजट 2018-19 पेश करेंगे। मोदी सरकार के कार्यकाल का यह अंतिम पूर्ण बजट होगा जबकि ऐतिहासिक वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद यह पहला आम बजट है। वित्त मंत्री हर साल फरवरी के महीने में देश का आम बजट पेश करते हैं। पहले आम बजट फरवरी के अंतिम दिन यानी 28 या 29 फरवरी को आता था। पिछले साल से आम बजट एक फरवरी को पेश करने की परंपरा शुरु हुई।
बजट के होते हैं दो भाग
बजट के दो भाग होते हैं। एक भाग में केंद्र सरकार की आय का विवरण तथा दूसरे भाग में व्यय का विवरण होता है। फिर व्यय को दो भागों में बांटा जाता है- पहला, भारत की संचित निधि में से किया जाने वाला व्यय जो इस प्रकार है- राष्ट्रपति का वेतन, भत्ते तथा उसके पद संबंधी अन्य व्यय, लोकसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति तथा उप-सभापति के वेतन तथा भत्ते, भारत सरकार पर ऋण तथा उसका ब्याज आदि, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते, संघीय न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन, नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक के वेतन तथा भत्ते, किसी न्यायालय या मध्यस्थ न्यायालय के निर्णय, आज्ञा आदि की लागू करने के लिए जो धनव्यय किया जाता है, अन्य कोई व्यय जिसको संसद कानून द्वारा इस निधि में से लेने के लिए घोषणा कर दे।
दूसरा, साधारण व्यय, उपर्युक्त सभी व्यय को छोड़कर शेष सभी व्यय को संसद में मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाता है तथा व्ययों के संबंध में अनुदानों के लिए मांगें प्रस्तुत की जाती हैं। कोई भी मांग राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं की जा सकती। साधारण व्यय दूसरे भाग में आता है।
बदलते समय में बदला बजट का स्वरूप
सामान्यत: सालाना बजट वित्त मंत्रालयों में उनके बांटे गए विभाग द्वारा बनाए जाते हैं। जिसकी अंतिम मंजूरी राष्ट्रपति द्वारा दी जाती है जोकि केंद्र व राज्य सरकार दोनों के संबंध में होती है। बजट के मुख्य रूप से दो ही प्रकार हुआ करते थे- केन्द्रीय बजट और रेल बजट। रेल बजट आम बजट से दो दिन पूर्व पेश किया जाता था। हालांकि पिछली बार से सरकार ने रेल बजट को आम बजट में ही समाहित कर दिया है।
संविधान के प्रावधानों के अनुरूप 31 मार्च से पहले अनुदान की मांगें पारित हो जानी चाहिए ताकि नये वित्त वर्ष में संचित निधि से धन निकालने में दिक्कत न आए। इसके अलावा आम बजट में कर प्रस्ताव पेश होने के 75 दिन के भीतर वित्त विधेयक पारित हो जाना चाहिए।