BMS Labour Policy: अर्थव्यवस्था मजबूत बनाने में अच्छा योगदान दे सकती है बेहतर श्रमिक नीति
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विस्तार
लगभग साल भर पहले यानी अप्रैल 2022 में देश में श्रमिकों की कुल संख्या 43.72 करोड़ के करीब थी। इसमें 41 फीसदी से ज्यादा श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे, तो 26 फीसदी से कुछ अधिक विभिन्न उद्योगों या निजी स्तर पर किए जा रहे औद्योगिक उत्पादन में लगे थे। कृषि क्षेत्र या निजी क्षेत्र में कार्य कर रहे श्रमिकों से इतर केवल औद्योगिक क्षेत्रों में जुटे कर्मचारियों की बात करें, तो इस प्रत्येक कार्यबल के साथ एक परिवार के जुड़े होने का अनुमान किया जाता है। इसकी कामकाजी परिस्थिति बेहतर होने का सीधा लाभ एक पूरे परिवार को मिलता है। इसका सकारात्मक असर शिक्षा-स्वास्थ्य के साथ-साथ देश की आर्थिक तरक्की में देखने को मिल सकता है।
लेकिन आलोचकों की राय है कि आर्थिक निवेश की उम्मीद में कंपनियों को इसी कार्यबल के लिए मनचाही नीतियां बनाने का दबाव हर देश पर पड़ रहा है। इससे दुनिया के हर देश में श्रमिकों की स्थितियां लगातार जटिल हो रही हैं। भारत भी इसमें अपवाद नहीं है। यही कारण है कि श्रमिक संगठन कर्मचारियों के हितों के लिए उन्मुखी योजनाएं बनाने के लिए लगातार मांग कर रहे हैं। भारतीय मजदूर संघ ने अपने पटना के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी इसी तरह के बदलाव की मांग की।
क्यों बढ़ी समस्या
अर्थव्यवस्था के जानकार डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने अमर उजाला से कहा कि पश्चिमी व्यापार मॉडल को अपनाते हुए अब दुनिया भर में कंपनियों के पक्ष में कानून बनाए जाने लगे हैं। उन्हें कर्मचारियों को 'हायर एंड फायर' करने की ज्यादा छूट मिलने को उद्योग को सशक्त बनाने के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है। इसका उद्देश्य कंपनियों को कानूनी अड़चनों से बचाकर ज्यादा निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है। भारत में भी औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने इसी तरह की नीतियां पेश की हैं। हालांकि कर्मचारी संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।
कंपनियों को भी नुकसान
लेकिन अनेक अनुभव बताते हैं कि इसका कई स्थानों पर दुरुपयोग हो रहा है। कंपनियां व्यावसायिक हितों के लिए कर्मचारियों के हितों की उपेक्षा कर रही हैं। इसका तात्कालिक असर यह हो रहा है कि कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा है और मुकदमेबाजी कम हुई है। लेकिन इसका नकारात्मक असर यह हो रहा है कि कर्मचारियों की अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। उन्हें अपने साथ-साथ अपने परिवार के हितों की भी अनावश्यक चिंता से लगातार जूझना पड़ रहा है। इसका सीधा असर उनके पारिवारिक जीवन और कार्य क्षमता पर पड़ रहा है।
अच्छे कर्मचारियों की कमी
डॉ. नागेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि जो नई श्रमिक नीति अब तक कंपनियों के हितों को ध्यान में आगे बढ़ाई जा रही थी, अब उसका नकारात्मक असर स्वयं कंपनियों को भी भुगतना पड़ रहा है। अपने भविष्य की अनिश्चितता और काम के अनावश्यक दबाव के कारण कर्मचारियों की उत्पादकता कम हो रही है। एक स्थान पर अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता उन्हें बेहतर अवसर के लिए दूसरी जगहों पर ज्यादा जल्दी से तलाशने को मजबूर कर रही है। इससे कंपनियों को लंबी अवधि में दक्ष कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं।
यही कारण है कि बेहतर कर्मचारियों को अपने यहां रोकने के लिए कंपनियों को तरह-तरह की तरकीबें अपनानी पड़ रही हैं। वे कर्मचारियों के लिए बेहतर योजनाएं पेश करने लगी हैं। कार्य स्थल पर भी कर्मचारियों को तनाव मुक्त रखने के लिए विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं।
इन प्रयासों की अपनी उपयोगिता साबित भी हो रही है। लेकिन समझना चाहिए कि कर्मचारियों को उनके भविष्य के प्रति आश्वस्त किए बिना उन्हें तनाव से मुक्त नहीं रखा जा सकता। विशेषकर निचले स्तर के कर्मचारियों में अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता ज्यादा होती है। आवश्यकता है कि एक बेहतर पॉलिसी बनाकर उनके काम की तुलना में उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति आश्वस्त किया जाए। इस तरह की सकारात्मक नीतियों से तनाव मुक्त कर्मचारी संस्थान के लिए ज्यादा उपयोगी साबित हो सकेंगे।