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अधर में अटका रॉ शुगर के निर्यात का मामला
ब्यूरो/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Sat, 26 Apr 2014 03:27 PM IST
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रॉ शुगर निर्यात पर सब्सिडी देकर चीनी उद्योग को उबारने की कोशिशों पर नौकरशाही भारी पड़ रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गत फरवरी में वित्तीय संकट से जूझ रही चीनी मिलों को निर्यात सब्सिडी का तोहफा दिया था।
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लेकिन मार्च के बाद सब्सिडी का मामला फिर खाद्य मंत्रालय की फाइलों में फंस गया है। इस छूट के जरिए केंद्र सरकार ने दो साल में 40 लाख टन रॉ शुगर के निर्यात की उम्मीद जताई थी, लेकिन अक्तूबर से मार्च तक सिर्फ 8.5 लाख टन का निर्यात हुआ है।
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खाद्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि कैबिनेट ने हर दो महीने बाद रुपये और डॉलर के एक्सचेंज रेट के आधार पर सब्सिडी की समीक्षा का प्रावधान रखा है। जिसके अनुसार, अप्रैल-मई के लिए सब्सिडी पर नई अधिसूचना जारी की जाएगी। गत 28 फरवरी को मंत्रालय ने रॉ शुगर निर्यात के लिए प्रति टन 3,300 रुपये सब्सिडी का ऐलान किया था। लेकिन यह अधिसूचना सिर्फ फरवरी और मार्च के लिए थी।
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अब चीनी उद्योग की परेशानी यह है कि अप्रैल का तकरीबन पूरा महीना गुजरने के बावजूद अप्रैल-मई की सब्सिडी का ऐलान नहीं हुआ है। जबकि रॉ शुगर के निर्यात पर छूट को देखते हुए चीनी मिलों ने जोरशोर से रॉ शुगर बनानी शुरू कर दी थी।
कैबिनेट की ओर से तय फार्मूले के हिसाब से अप्रैल-मई के लिए निर्यात सब्सिडी करीब 3,800 रुपये प्रति टन बैठती है, जो पहले तय हुई दर से करीब 500 रुपये ज्यादा है। सब्सिडी बढ़ाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी आवश्यक है। मंत्रालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अप्रैल-मई के लिए 3,300 रुपये प्रति टन के हिसाब से निर्यात सब्सिडी का प्रस्ताव तैयार है, जिसे खाद्य मंत्री ने भी हरी झंडी दे दी है। लेकिन इसका ऐलान चुनाव आयोग की मंजूरी के बाद ही किया जाएगा।
सब्सिडी के इंतजार में 5 लाख टन रॉ शुगर
एक ओर जहां चीनी मिलों पर किसानों का बकाया बढ़कर 12 हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है, वहीं सब्सिडी के अटके फैसले ने भी चीनी मिलों की दिक्कतें बढ़ा दी हैं। देश भर की चीनी मिलें करीब 5 लाख टन से ज्यादा रॉ शुगर बना चुकी हैं, जिसका निर्यात सब्सिडी न मिलने की वजह से अटका हुआ है। चीनी मिलों का आरोप है कि जब एक बार कैबिनेट ने रॉ शुगर पर निर्यात सब्सिडी देने का फैसला कर दिया है, तब इस मामले को बार-बार कैबिनेट में भेजने की जरूरत नहीं है।
सब्सिडी की दर बढ़ाने की लिए कैबिनेट की मंजूरी चाहिए, लेकिन पुरानी दरों पर सब्सिडी जारी रखने का फैसला तुरंत हो सकता था। इसे बेवजह लटकाया जा रहा है।