उदारीकरण के बाद मोदी सरकार में सबसे तेज रही है अर्थव्यवस्था की विकास दर : केवी सुब्रमणियन
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मुख्य सांख्यिकी कार्यालय के अनुमान अनुसार भले ही इस साल की तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.6 फीसदी रही। लेकिन सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) केवी सुब्रमणियन का कहना है कि उदारीकरण के बाद जितनी भी सरकार बनी है, उन सबसे बेहतर विकास दर मोदी सरकार के समय रही। बीते साढ़े चार वर्षों के दौरान औसतन 7.3 फीसदी की विकास दर हासिल हुई है। अर्थव्यवस्था की स्थिति, सरकार द्वारा उठाए गए कदम एवं भविष्य की रणनीति पर अमर उजाला के शिशिर चौरसिया ने केवी सुब्रमणियन से बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश:
प्रश्न- आईबीसी आने से कितना फर्क पड़ा है? पहले 100 रुपये देने पर बैंक को कितना वापस आता था और अभी कितना वापस आ रहा है?
उत्तर- अभी एक झटके में यह जवाब देना मुश्किल है। इसे इस तरीके से समझिए कि उद्योगपतियों में जो डर बना है, उससे डिफाल्ट करने से डर रहे हैं। जब आईबीसी नहीं था, तब मान लिया जाए कि बैंक किसी को 100 रुपये का लोन देता था तो पहले ऐसा होता था कि ऋण का इस्तेमाल कर लिया और बैंक को पैसा वापस नहीं मिला। बैंक के पास तो बिल्डिंग गिरवी रखी है, लेकिन उद्योगपति बिल्डिंग से पूरा सामान निकालकर बैंक को सिर्फ बिल्डिंग वापस करते थे। इससे बैंकों को काफी कम पैसा वापस मिलता था। लेकिन आईबीसी आने से डर बना है। जहां तक आपका सवाल है, उसका जवाब देने के लिए काफी अनुसंधान की जरूरत है। ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। लेकिन अभी तक तीन लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई है और एनपीए का ग्राफ गिरा है। यह कम नहीं है। मैं इतना बता दूं, कि आपके सवाल पर भी हम काम कर रहे हैं और कुछ दिनों के बाद आपको सही नंबर भी दे सकेंगे।
प्रश्न- अभी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं चल रही है। तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.6 फीसदी तक आ गई है। इस पर आपका क्या मानना है?
उत्तर- वैसे, चार-पांच साल का आकलन करें तो अर्थव्यवस्था में काफी अच्छा काम हुआ है। ऐसा कहें कि उदारीकरण के बाद जितनी भी सरकार बनी है, उन सबसे बेहतर विकास दर मोदी सरकार के दौरान रही है। बीते साढ़े चार-पांच वर्षों का औसत देखें तो इस दौरान 7.3 फीसदी की विकास दर हासिल हुई है, जो किसी भी सरकार की विकास दर से बेहतर है। अब थोड़ा-बहुत उतार चढ़ाव तो होता रहता है। मेरा विश्लेषण सवाल करता है कि आपका प्रोसेस क्या है? यदि आपका प्रोसेस बेहतर है तो आउटकम बेहतर होगा ही। आप देखिए कि मौजूदा सरकार के दौरान कितने सारे सुधार हुए हैं।
प्रश्न- तो आपको लगता है कि अगले साल स्थिति फिर बेहतर हो सकती है?
उत्तर- जरूर। मेरा आकलन है कि 2019-20 में भारत की आर्थिक विकास दर बढ़कर 7.5 फीसदी तक पहुंच सकती है। इस बारे में हमने अपने सभी आकलन कर लिए हैं। सभी बाहरी एजेंसियों के साथ आंतरिक तौर पर हमारा अनुमान है कि अगले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.5 फीसदी रहेगी और मुद्रास्फीति की दर करीब चार फीसदी रहेगी। आप देखिए कि मोदी सरकार के कार्यकाल में जो 7.3 फीसदी की औसत विकास दर हासिल हुई है, उसमें मुद्रास्फीति की दर का भी बड़ा योगदान है। सरकार द्वारा सुधार के लिए उठाए गए कदमों की वजह से अभी मुद्रास्फीति की दर निचले स्तर पर है। पहले यह दर 10 फीसदी से ऊपर थी, जबकि बीते जनवरी में देखिए तो खुदरा मूल्य पर आधारित मुद्रास्फीति की दर 2.1 फीसदी थी। यदि यह दर 2014 के समान यानी 10 फीसदी के आसपास रहती तो रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें 30 से 35 फीसदी और महंगी रहती।
प्रश्न- मुद्रास्फीति की दरों में गिरावट तो फल-सब्जियों के सस्ते हाने यानी प्राकृतिक कारणों से हुई?
उत्तर- नहीं, यह यूं ही नहीं हुआ। इसकेलिए रिजर्व बैंक को चार फीसदी का लक्ष्य दिया गया था। इसके बाद रिजर्व बैंक ने उसी हिसाब से मौद्रिक नीति की रूप-रेखा खींची। हमने रिजर्व बैंक के लिए मुद्रास्फीति की दर को एक निश्चित दायरे में रखने का जो लक्ष्य निर्धारित किया था, उस पर काम हुआ। रिजर्व बैंक के गवर्नर के नेतृत्व वाली मौद्रिक नीति समिति ने उसी अनुरूप काम किया। इसके अलावा दिवालियापन और ऋणशोधन अक्षमता कानून (आईबीसी) एक महत्वपूर्ण कदम रहा।
प्रश्न- अब आगे विकास की गति कैसे बढ़ेगी?
उत्तर- देश में नव प्रवर्तन को बढ़ावा देने पर जोर देना होगा। आईबीसी आने के बाद आर्थिक विकास की गति तेज करने और रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए प्रभावी प्रतिस्पर्धा महत्वपूर्ण है। इसके लिए ऋण भुगतान में चूक करने वाली कंपनियों को दिशानिर्देशों के दायरे में लाया जा सके और ये कंपनियां बाजार के अनुकूल व्यवहार का अनुपालन कर सकें, ऐसा माहौल बन रहा है। आईबीसी से उद्योगपतियों में डर बना है कि गड़बड़ी करने पर कंपनी चली जाएगी। इससे डिफाल्ट करने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। इससे कॉस्ट ऑफ कैपिटल या बैंकिंग भाषा में कहें तो क्रेडिट स्प्रेड घटेगा। साथ ही प्रोबेबिलिटी ऑफ डिफाल्ट घटेगा, जो अभी भी कम हो रहा है। पिछले दिनों में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के एक कार्यक्रम में मैंने यही कहा था कि नव प्रवर्तन को बढ़ावा देने के साथ बाजार में ऐसा माहौल बनाना होगा कि कोई किसी बात का गलत फायदा नहीं उठा सके। बड़े और छोटे उद्योगपति को एक समान अवसर मिले।
प्रश्न- बाजार में रोजगार की दर उस तरीके से नहीं बढ़ी, जैसे बढ़नी चाहिए?
उत्तर- रोजगार मापने की हमारी ढांचागत संरचना अभी ठीक नहीं है। अभी जो भी आंकड़े आ रहे हैं, वह दोष से मुक्त नहीं है। दरअसल यह सब आंकड़े सैंपलिंग से आते हैं और जब सैंपल ही दोषपूर्ण हो तो परिणाम ठीक नहीं आ सकता। सैंपल में यदि किसी तरफ झुकाव होगा, तो परिणाम में भी झुकाव होगा। वैसे भारत में यह जानना भी मुश्किल है। क्योंकि भारत में करीब 80 फीसदी असंगठित क्षेत्र है। यहां लोगों को नौकरी तो है पर अच्छी नौकरी नहीं है। वैसे मैं बता दूं कि 90 के दशक के बाद भारत ही नहीं, दुनिया भर में नौकरियों केअवसर घट रहे हैं। मजदूरों का काम मशीन करने लगी है। लेकिन भारत में कुछ ऐसे भी क्षेत्र उभरे हैं, जहां नौकरियों के अवसर बढ़ रहे हैं। स्विगी, अमेजन, फ्लिपकार्ट को देखिए, वहां रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। इसी तरह ओला और उबर में भी देखिए, वहां भी रोजगार के अवसर बढ़े हैं।