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अगर आपको पता हो आप कब मरेंगे

Tue, 21 Jun 2016 01:54 PM IST
रोज़ एवलेथ/ बीबीसी
रोज़ एवलेथ/ बीबीसी Updated Tue, 21 Jun 2016 01:54 PM IST
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 You know when you will die
मौत का दिन - फोटो : BBC

क्या आपको अपनी मौत का दिन मालूम है? नहीं मालूम ना! अगर ऐसा होता कि कोई आपको आपकी मौत का दिन और वक्त बता देता तो क्या होता? क्या आपकी सोच में कोई फर्क आता? क्या आप जिंदगी को नए नजरिए से देखते? जैसे आप आज अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं, उससे अलग हटकर जिंदगी जीने की कोशिश करते? जब लोग मौत के साए में जीते हैं, तो उनकी सोच में, उनके जीने के ढंग में फर्क आ जाता है।

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अमरीका की इवा हैगबर्ग फिशर को ही ले लीजिए। वो पीएचडी की छात्रा हैं। वो लेखिका हैं। वो आर्किटेक्चर पर भी लिखती हैं। हाल ही में उनकी दूसरी किताब छपी है। पिछले आठ सालों से वो इस खौफ के साए में जीती रही हैं कि वो कितने दिन और जिएंगी।
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2008 में जब वो न्यूयॉर्क में रह रही थीं तो उन्हें अजीब सा महसूस होना शुरू हुआ। उन्हें चक्कर आते थे। हमेशा प्यास लगी रहती थी। जनवरी में एक दिन वो रात में उठकर किचन में गईं तो यूं लगा कि फर्श उठकर उनके पास आता जा रहा है। या फिर वो गिर रही हैं। दिमाग में अजीबो-गरीब आवाजें गूंज रही थीं।

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इवा डॉक्टर के पास पहुंचीं। एमआरआई कराया। डॉक्टरों को लगा कि उन्हें ट्यूमर है।

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मौत का दिन - फोटो : BBC

इवा डॉक्टर के पास पहुंचीं। एमआरआई कराया। डॉक्टरों को लगा कि उन्हें ट्यूमर है। उन्होंने इसका इलाज कराया। मगर कोई फायदा नहीं हुआ। इवा को लगा कि वो न्यूयॉर्क में रहने के तनाव से जूझ रही हैं। इसीलिए वो पोर्टलैंड शहर में जाकर रहने लगी।

अगले आठ सालों तक वो पोर्टलैंड से बर्कले और फिर सैन फ्रैंसिस्को में रहने की कोशिश करती रहीं। हर जगह उनकी हालत बद से बदतर होती गई। डॉक्टरों ने इवा पर तमाम तरह के तजुर्बे किए। कभी उन्हें तनाव का शिकार बताया और कभी ट्यूमर का। किसी ने उन्हें छात्र जीवन की फिक्र का शिकार कहा तो किसी ने 'वोल्फ-पार्किंसन-व्हाइट' नाम की बीमारी की मरीज।

वो टेस्ट कराते कराते हैरान-परेशान हो चुकी थीं। कभी डॉक्टरों के चक्कर और कभी अस्पताल में भर्ती होकर इवा ने कोशिश की कि उन्हें अपनी हैरानी-परेशानी-फिक्रमंदी भरी जिंदगी में राहत मिले। मगर ऐसा हो ही नहीं रहा था। तमाम टेस्ट के बाद डॉक्टर उन्हें यही बताते थे कि उन्हें डायबिटीज नहीं है, सिफलिस नहीं, एड्स नहीं, लीवर कैंसर नहीं। बाद में उन्हें 'वोल्फ-पार्किंसन-व्हाइट' नाम की बीमारी से भी क्लीन चिट मिल गई। 

ब्रेन ट्यूमर से लेकर गर्भाशय के कैंसर जैसी बीमारियों की आशंका थी।

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मौत का दिन - फोटो : BBC

मगर जो तनाव, जो चक्कर आने, प्यास लगने, सोते-सोते अचानक से उठने की दिक्कत उन्हें थी वो दूर ही नहीं हो रही थी। एक बार तो सैन फ्रैंसिस्को शहर के मशहूर गोल्डेन गेट ब्रिज से गुजरते वक्त उन्हें ऐसा लगा कि मौत बस उन्हें अपने साथ ले जाने वाली है। उस वक्त वो एंबुलेंस से अस्पताल जा रही थीं।

आखिर में जब इवा के दिमाग का एमआरआई हुआ तो पता चला कि उनके दिमाग के एक हिस्से से खून का रिसाव हुआ था। इवा के अगले कुछ साल किसी सास-बहू सीरियल जैसे ट्विस्ट के साथ गुजरे। जहां पर सस्पेंस था। थ्रिल भी था। ब्रेन ट्यूमर से लेकर गर्भाशय के कैंसर जैसी बीमारियों की आशंका थी। बीमारी और इलाज से बेहाल इवा ने शादी कर ली और वो एरिजोना में जाकर रहने लगीं।

लेकिन राहत उससे भी नहीं मिली। वो वापस कैलिफोर्निया आकर रहने लगीं। कैलिफोर्निया में एक डॉक्टर ने बताया कि इवा को मास सेल एक्टिवेशन नाम की दिक्कत है। जिसमें उनके शरीर की कुछ कोशिकाएं, ज़्यादा केमिकल छोड़ रही हैं।

मौत का अंदाजा होते ही आपके खयालों में बड़ा फर्क आ जाता है।

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मौत का दिन - फोटो : BBC

बरसों बाद इवा अब बिना किसी टेस्ट के, बिना किसी इलाज के रह रही हैं। उन्हें काफी आराम है। लेकिन आज भी इवा को अपनी जिंदगी और मौत के बीच ज्यादा फासला नजर नहीं आता। इसी वजह से जिंदगी के प्रति उनका नजरिया काफी बदल गया है।

अब इवा आज में, इसी पल में जीती हैं। वो बरसों बाद की योजानाएं नहीं बनातीं। हद से हद हफ्ते दो हफ्ते की प्लानिंग करती हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि मौत का खयाल हमारी सोच पर गहरा असर डालता है। जैसे ही किसी को अपनी मौत के करीब होने का एहसास होता है, वो जिंदगी की अहमियत को ज़्यादा गहराई से समझने लगता है।

वो इंसान हर पल को जीने लगता है। यूं तो किसी की मौत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। मगर आजकल कुछ वेबसाइट हैं जो आपकी मौत की तारीख और वक्त बताने के दावे करती हैं। कुछ बीमा कंपनियां भी अपने ग्राहकों की संभावित उम्र का अंदाजा लगाती हैं। वैज्ञानिकों को इन दावों में कोई वजन नहीं दिखता। मगर, इस वजह से लोगों की सोच बदल जाती है। 

वो जिंदगी का भरपूर लुत्फ उठाने की कोशिश करते हैं। मौत का अंदाजा होते ही आपके खयालों में बड़ा फर्क आ जाता है। लोग ज्यादा धार्मिक हो जाते हैं। ज्यादा हमलावर हो जाते हैं।

यूं लगता था कि वो बस ये दुनिया छोड़कर जाने वाली हैं।

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मौत का दिन - फोटो : BBC

 अगर आगे चलकर विज्ञान इतनी तरक्की कर ले कि इंसान की मौत की भविष्यवाणी की जा सके, तो क्या हमारी सोच बदल जाएगी? वैसे भी मौत को दूर खड़ी देखकर दूसरी सोच होती है। क्योंकि पता तो सबको होता है कि मौत आनी है।

लेकिन, जब आपको ये मालूम हो कि आप अगले कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों में गुजर जाने वाले हैं, तो आपका नजरिया एकदम अलग होगा। इवा की ही मिसाल लीजिए, करीब दस सालों तक वो मौत के डर में जीती रहीं। कोई उन्हें बीमारी नहीं बता पा रहा था। यूं लगता था कि वो बस ये दुनिया छोड़कर जाने वाली हैं।

इसीलिए वो आज खुलकर जीती हैं। जब भी जोर से हंसती हैं, इसे याद रखती हैं कि किसी खास पल को उन्होंने कैसे महसूस किया था, जिया था। यूं तो बहुत से लोग ये मशविरा देते हैं कि हर दिन को जिंदगी के आखिरी दिन की तरह दजीना चाहिए।

एप्पल के स्टीव जॉब्स की मिसाल हर कोई देता है, जो रोज आईने के सामने खड़े होकर खुद को याद दिलाते थे कि आज अगर जिंदगी का आखिरी दिन होता तो वो इसे कैसे गुजारते। मगर, मौत के साए में जीना हमारी सोच को बदल देता है। हम लंबी योजनाएं बनाने के बजाय, आज में जीना शुरू करते हैं। हर पल का मजा लेने की कोशिश करते हैं। यानी मौत के खौफ में ही जिंदगी का लुत्फ है।

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