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जब धरती के सभी महाद्वीप जुड़कर एक हो जाएंगे, क्या होगा फिर?

Thu, 13 Feb 2020 08:19 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Thu, 13 Feb 2020 08:19 PM IST
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What happen when all the continents of the earth will unite
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

हमारी धरती सात महाद्वीपों में बंटी है। एशिया, अफ्रीका, यूरोप, उत्तर और दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका। इसी तरह यहां पांच महासागर हैं। प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, हिंद महासागर, आर्कटिक महासागर और दक्षिणी महासागर। वैज्ञानिक कहते हैं कि भविष्य में सारे महाद्वीप एक दूसरे से जुड़कर एक हो जाएंगे। उन्होंने इसका नाम भी रख लिया है, 'पैंजिया प्रॉक्सिमा'। ऐसा होने पर आप आराम से ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका के अलास्का सूबे तक पैदल चलकर जा सकेंगे या फिर आप यूरोप के स्कैंडीनेविया से दक्षिण अमेरिका के पैटागोनिया तक आराम से टहलते हुए जा सकेंगे। 

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अमेरिका के इलिनॉय शहर की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के क्रिस्टोफर स्कॉटीज इस ख्याल को लेकर बहुत उत्साहित हैं। वो कहते हैं कि आज से पांच करोड़ साल बाद ऑस्ट्रेलिया, आकर दक्षिणी पूर्वी एशिया से टकराने लगेगा। इसी तरह अफ्रीकी महाद्वीप की यूरोप से टक्कर होने लगेगी। उस वक्त अटलांटिक महासागर का दायरा भी बहुत बढ़ जाएगा।
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ये सब इस वजह से होगा क्योंकि धरती के अंदर की चट्टानें लगातार खिसक रही हैं। इनके खिसकने के साथ ही समंदर और महाद्वीप भी खिसक रहे हैं। इनके खिसकने की रफ्तार से ही वैज्ञानिकों ने अंदाजा लगाया है कि 25 करोड़ साल बाद सारे महाद्वीप एक दूसरे से जुड़ जाएंगे। स्कॉटीज ने तो बाकायदा इसका एनिमेशन भी तैयार कर लिया है। हालांकि वो ये भी कहते हैं कि पांच करोड़ साल से आगे जाकर क्या होगा, ये कहना मुश्किल है। 
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असल में धरती कई परतों से बनी है। इसकी ऊपरी प्लेट पर महाद्वीप और महासागर स्थित हैं। धरती की ये ऊपरी परत या प्लेट लगातार खिसक रही है। इसकी रफ्तार 30 मिलीमीटर सालाना है। आज धरती की प्लेट के खिसकने पर सैटेलाइट से निगरानी रखी जाती है। मगर हमें इस तकनीक के ईजाद होने से पहले ही पता था कि धरती की परतें खिसक रही हैं। 

ये ख्याल सबसे पहले जर्मन भूवैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगनर को करीब सौ साल पहले आया था। उन्होंने देखा कि कुछ जानवरों के जीवाश्म जो अलग अलग महाद्वीपों पर पाए गए, बहुत मिलते-जुलते हैं। उन्हें समझ में नहीं आया कि दक्षिणी अमेरिका और भारत, जो इतने दूर हैं, वहां करोड़ों साल पहले एक जैसे जानवर कैसे रहते होंगे? अल्फ्रेड वेगनर ने कहा कि जब ये जीव जिंदा रहे होंगे, तब धरती के सारे महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े रहे होंगे। उन्होंने ये भी देखा कि जैसा दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका का नक्शा है, यूं लगता है कि दोनों एक दूसरे से टूटकर दूर गए हैं। आज अगर दोनों इकट्ठे हो जाएं तो एक खांचे में फिट हो जाने जैसा होगा। 

हालांकि जब वेगनर ने अपना ख्याल जाहिर किया था, तो उस वक्त उसे खारिज कर दिया गया था, लेकिन वेगनर का महाद्वीपों के खिसकने का सिद्धांत बाद में जाकर सही पाया गया। लेकिन वेगनर के सिद्धांत के राज, महाद्वीपों में नहीं, महासागरों के भीतर छुपे हुए थे। उन्हें उजागर किया अमेरिकी भूवैज्ञानिक मैरी थार्प ने। मैरी ने पचास के दशक में बताया था कि महासागरों की तलहटी समतल नहीं है। समंदर की लहरों के नीचे बड़े बड़े पहाड़, पठार और ऊबड़-खाबड़ इलाके हैं। मैरी ने समंदर की तलहटी का नक्शा तैयार किया। पता चला कि अटलांटिक महासागर के अंदर हजारों किलोमीटर लंबी पर्वतमाला है, जिसकी चौड़ाई कई किलोमीटर है। 

दूसरे महासागरों के अंदर भी ऐसे बड़े बड़े पहाड़ छुपे हैं। समंदर के भीतर के इन पहाड़ों पर से पर्दा उठने पर पता चला कि हमारी धरती का धरातल कैसे बना था। समंदर के भीतर के इन पहाड़ों की अहमियत को हमें समझाया, अमेरिकी नौसेना के अधिकारी हैरी हेस ने। हैरी, दूसरे महायुद्ध के दौरान पनडुब्बी के कमांडर रहे थे। उन्होंने समुद्र के भीतर के कुछ नक्शे, सोनार की मदद से तैयार किए थे।

हैरी का कहना था कि समुद्र का धरातल लगातर बदल रहा है। धरती की कोख में जो आग धधक रही है, उसका लावा अक्सर नीचे से ऊपर आता है। ये लावा समुद्र की तलहटी में फैलता जाता है। जब धरती के भीतर के दबाव से लावा बाहर आता है तो ऊपर की चट्टानें इधर-उधर होकर उस लावा को निकलने का रास्ता देती हैं। यही चट्टानें एक-दूसरे के ऊपर चढ़ती जाती हैं। इस तरह बनतें हैं समंदर के अंदर के पहाड़।

अब चूंकि धरती के भीतर से लावा लगातार निकल रहा है। इस वजह से समंदर के अंदर चट्टानों की हलचल मची हुई है। इसको ऐसे समझिए कि किसी बरतन में सूप उबल रहा है और वो चारों तरफ फैल रहा है। धरती के अंदर की गर्मी की वजह से जो लावा निकल रहा है, वो कुछ-कुछ बरतन में सूप उबलने जैसा ही है। समुद्र की तलहटी की बनावट में बदलाव के असर से महाद्वीप भी खिसक रहे हैं।

असल में सारे महाद्वीप, टेक्टोनिक प्लेट के ऊपर स्थित हैं। इनके नीचे की ये धरती की परत, समुद्र की तलहटी से निकल रहे लावे के दबाव से खिसक रही हैं। इसलिए महाद्वीप भी लगातार खिसक रहे हैं। इसके सबूत वैज्ञानिकों को समुद्र तल से मिले हैं। वहां की चट्टानों की पड़ताल से पता चलता है कि वो कितनी पुरानी हैं। 

आज वैज्ञानिकों ने नई नई मशीनों से इस बात के काफी सबूत जुटा लिए हैं कि समंदर के अंदर का धरातल धरती की कोख से निकल रहे लावे की वजह से लगातार फैल रहा है। इस फैलाव के असर से महाद्वीप भी अपनी जगह से खिसक रहे हैं। हालांकि इसकी रफ्तार बहुत कम है। मगर इससे वेगनर और हैरी हेस के विचार आज सही साबित हुए हैं। इसी थ्योरी की बुनियाद पर स्कॉटीज जैसे वैज्ञानिक ये मानते हैं कि आज महाद्वीपों में बंटी धरती की जमीन पहले इकट्ठी थी।

धरती के अंदर मची हलचल की वजह से जमीन के ये हिस्से एक दूसरे से दूर होते गए। हालांकि ऐसा होने में करोड़ों साल लग गए। इस बात के सबूत हैं, वो जीवाश्म जो अलग-अलग महाद्वीपों में मिलते हैं। जैसे की मूंगे की चट्टानों के जीवाश्म जो अफ्रीका के उत्तरी हिस्से में भी पाए जाते हैं और अंटार्कटिका के पास भी। यानी करोड़ों साल पहले आज का अफ्रीका, अंटार्कटिका से लगा हुआ था। 

इसी तरह आज के मगरमच्छ जैसे एक जानवर मेसोसॉरस के जीवाश्म दक्षिण अमेरिका में भी पाए जाते हैं और अफ्रीका में भी, जबकि मेसोसारस मीठे पानी में रहता था। ऐसे में वो अटलांटिक महासागर के खारे पानी को पार करके अमेरिका से अफ्रीका पहुंचा होगा, ऐसा सोचना ही गलत है। ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि मेसोसॉरस धरती पर तब रहता था, जब अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका एक दूसरे से जुड़े हुए थे।

ऐसा करीब तीस करोड़ साल पहले था। तब अमेरिका और अफ्रीका के बीच अटलांटिक महासागर था ही नहीं। ऐसा ही एक और घास खाने वाला जीव था लिस्ट्रोसॉरस, जिसके कंकाल अफ्रीका, भारत और अंटार्कटिका तक में मिलते हैं। इसी तरह एक झाड़ी ग्लॉसोप्टेरिस के अंश, भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और अफ्रीका में मिले हैं। इसके बीज इतने भारी थे कि हवा में उड़कर समंदर पार नहीं जा सकते थे। 

वैज्ञानिक कहते हैं कि तब धरती के सारे महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे। वो इसे पैंजिया कहते हैं। स्कॉटीज जैसे वैज्ञानिक मानते हैं कि जिस तरह से महाद्वीपों के नीचे की चट्टानें खिसक रही हैं, उससे अगले 25 करोड़ साल बाद सारे महाद्वीप फिर से एक-दूसरे से जुड़ जाएंगे। हालांकि तीस से पचास करोड़ साल पहले धरती का रूप कैसा था, ये कहना बड़ा मुश्किल है। इसके पुख्ता सबूत नहीं मिलते। लेकिन, जिस तरह महाद्वीपों की प्लेट खिसक रही हैं, उससे आज से पच्चीस-तीस करोड़ साल आगे का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी अंदाज के मुताबिक, 25 करोड़ साल बाद धरती के सारे महाद्वीप एकजुट होंगे। 

लेकिन ये बातें सिर्फ अनुमान ही हैं। पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता कि धरती की परतें कैसे मुड़ेंगी? क्या रुख अपनाएंगी? बस एक बात पुख्ता तरीके से कही जा सकती है। वो ये कि धरती के अंदर खलबली मची है। इसके असर से धरती की ऊपरी परत खिसक रही है। धरती की प्लेट खिसकने से करोड़ों साल बाद क्या होगा, किसे पता? कौन उसे देखने को, उसकी तस्दीक करने को बैठा रहेगा? तब तक अंदाजा लगाने में क्या हर्ज है? इसमें भी तो खूब मजा आता है।  

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