कहां-कैसे तय होती है औरत की खूबसूरती?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जितना पुराना इश्क है उतने ही पुराने औरत को हासिल करने और उस पर हक जमाने के किस्से हैं। ये एक तरह की जिद रही है कि स्त्री के खूबसूरत शरीर को अपना बना लिया जाए। लेकिन खूबसूरती या सुंदरता क्या है?
इसकी कल्पना और परिभाषा दुनिया के हर क्षेत्र में अलग-अलग है।
हर देश औरत के हुस्न को अलग नजरिए से देखता है। भारत जैसे गोरेपन से आक्रांत देश में किसी काली अफ्रीकी स्त्री को 'सुंदर' की श्रेणी में रखा जाना, अपने आप में चुनौती से कम नहीं। लेकिन सच यह है कि उसी काली स्त्री को उसके अपने देश में 'बला की खूबसूरत' माना जाता है।
सुंदरता के पैमाने वाकई हम सभी के जेहन में बेहद अलग-अलग हैं। पूरे विश्व में कैसी औरतों को सुंदर माना जाता है और क्यों, इस स्पेशल स्टोरी में जानिए।
छोटे पैर, खूबसूरती की निशानी
अमेरिका की एक नामी लेखिका पर्ल एस बक एक बार चीन की यात्रा पर गईं और वहां कुछ दिनों के लिए बच्चों की मिशनरी में ठहरीं। अब तक वह अपने सुनहरे बालों, नीली आंखों, लंबी नाक और लंबे पैरों के लिए खूब चर्चाएं बटोरती आईं थीं। लेकिन चीन के लोगों ने उनके चेहरे को पसंद नहीं किया, उनके रूप को नकार दिया और किसी दूसरे ग्रह से आए इंसान के तौर पर देखने लगे। छोटी आंखें और चिपटे नाक वाले लोगों के बीच ऐसा चेहरा उनके लिए अजनबी था।
कातिलाना नैन-नक्श होने के बावजूद उन्हें चीन के लोग सुंदर नहीं मान सके। चीन के लोगों की आज भी यही मान्यता है कि किसी महिला की जितनी छोटी नाक, छोटे पैर और छरहरा बदन होगा, वो उतनी ही खूबसूरत होगी।
चीन में सदियों पुरानी एक परंपरा भी थी जिसमें लड़कियों के पैरों को चार साल की उम्र से ही छोटे जूतों में जबरदस्ती बांधकर रखा जाता था।
इसे हम अब 'फुट बाइंडिंग' के नाम से भी जानते हैं।
हर समय जानबूझकर छोटे जूते पहनाए जाने से लड़कियों के पैर मुड़ जाते थे। पहले इस परंपरा को राज घराने की लड़कियां अपनाती थीं। हुस्न का मतलब छोटे पैर हुआ करते थे और वो रईस परिवार से होने की निशानी भी थी।
हालांकि समय बीतने के साथ इस परंपरा को मध्य वर्गीय परिवारों की भी लड़कियों ने अपना लिया। छोटे जूते पहनाए जाने से पहले लड़कियों के पैरों में एक किस्म का प्लास्टर चढ़ाया जाता था।
यह प्रक्रिया बहुत दर्द भरी थी और इसकी वजह से कई लड़कियों की या तो मौत हो जाती थी या फिर वो मानसिक रूप से हमेशा के लिए विक्षिप्त हो जाती थी।
इसी कारण चीनी सरकार ने 1911 में इसे प्रतिबंधित कर दिया। जो फैरल नाम की महिला फुट बाइंडिंग की आखिरी जीवित महिला हैं। वो 102 साल की हैं और हॉन्ग कॉन्ग में रहती हैं।
खूबसूरत हंसी के लिए अपनाए काले दांत
सड़े, काले और बदबूदार दांत किसी को भी पसंद नहीं होते। पर जापान में एक वक्त ऐसा भी था महिला की खूबसूरती को उसके काले दांतों से ही आंका जाता था।
कई दशकों पहले वहां की औरतें अपने दांतों को जानबूझकर काला करती थीं। जी हां, राते के अंधेरे से भी काले दांत और एकदम सफेद पुता हुआ चेहरा, खूबसूरती का पर्याय था।
शादीशुदा महिलाएं एक रसायन में सिरका मिलाकर एक खास प्रकार का डाई तैयार किया करतीं थीं। वो इसे अपने सभी दांतों पर लगातीं थीं। साथ ही ऐसा मेकअप करती थी कि चेहरा पूरी तरह से पाउडर जितना सफेद दिखने लगता था। सोचिए जरा, काले दांत और सफेद चेहरा कैसा लगता होगा?
न सिर्फ महिलाएं अपने पतियों को रिझाने के लिए इस सुंदरता की तकनीक को अपनाती थी बल्कि अपनी किशोर लड़कियों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देती थीं। इस मेकअप को जापान में उहागुरो नाम से जाना जाता था।
वैसे एक मान्यता यह भी थी कि ऐसी डाई दांतों पर लगाते रहने से वो जल्दी सड़ेंगे नहीं और असली सफेद दांत ज्यादा दिनों तक साथ रहेंगे। अपने दांतों को गिरने से रोकने और ताउम्र खूबसूरत हंसी के लिए उहागुरो को अपनाया जाता था।
होंठ में जड़ा बड़ा प्लेट, एक श्रृंगार
किसी शख्स का जन्म से ही सुंदर होना कई बार उसके समाज के लिए पर्याप्त नहीं होता। कई समाजों में स्त्रियों को अपने बदन पर ऐसे प्रयोग करने पड़ते हैं जिससे आधार पर ही वो संपूर्ण मानी जाती हैं।
दक्षिण अफ्रीकी देशों में आम तौर पर महिला की खूबसूरती को उसके भरे-पूरे बदन से मापा जाता है। वहां बड़े कूल्हे, भरी छाती और मोटे होंठों को सुंदर माना जाता है। अधिक काली रंगत को भी खूबसूरती से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन दक्षिण अफ्रीका में जनजातियों में सुंदरता को पाने के किस्से आपको चौंका देंगे।
सुडान के नजदीक इथोपिया में रहने वाली मुर्सी जनजाति की औरतों को होठों में लिप प्लेट डलवानी पड़ती है। क्ले (एक तरह की मिट्टी) या फिर लकड़ी से बनी ये प्लेट गोल और चौकोर दोनों तरह की होती हैं। इसे पहनना इस समुदाय का नियम है।
बताया जाता है कि गुलामों के व्यापारी पहले महिलाओं को अगवा करके ले जाते थे। महिलाओं को अगवा होने से बचाने के लिए उन्हें बदसूरत बनाने की कोशिश की जाती थी। इसके तहत उनके होंठ के निचले हिस्से के बीच प्लेट लगाया जाने लगा। इस प्लेट का आकार वक्त-वक्त पर बढ़ाया जाता था।
समय के साथ यही बड़ी प्लेट औरत के संपूर्ण होने का मतलब बन गई, एक परंपरा के तौर पर। तब से अब तक इसे अपनाया जाता है। दर्दनाक होने के बावजूद ये परंपरा सभी की पसंदीदा है।
मादकता की निशानी, जिराफ जैसी गर्दन
मिलिए बर्मा की कायन जनजाति के लोगों से। कायन लहवी, कायन का खुंग और कायन लहता, तीन समूहों में बंटी इस जनजाति की लड़कियां जवान होने पर सुदंर दिखें, इसकी कोशिश में बचपन से लग जाती हैं। इस जनजाति में हर लड़की को बचपन से ही गर्दन में चूड़ियों जैसी कुछ रिंग्स पहननी होती हैं।
ये रिंग्स तांबे की बनी होती हैं। ये कॉयल या स्प्रिंग जैसा होता है जो गर्दन के नीचे सिरे से लेकर ऊपर तक पहना जाता है। उम्र बढ़ने के साथ ही इन रिंग्स की गिनती बढ़ा दी जाती है। एक समय ऐसा आता है जब लड़की की गर्दन अजीबोगरीब रूप से ऊंची हो जाती है। ऐसे में चेहरा छोटा दिखने लगता है। लेकिन इस जनजाति में लंबी गर्दन को मादक माना जाता है।
इस रिंग को पहनने के बाद कई औरतों को कॉलर बोन के दर्द की शिकायत होती है। मेडिकल जांच बताती हैं कि रिंग्स पहनने की वजह से औरतों के गले के नीचे की पसलियां कमजोर हो जाती हैं।
हालांकि अब कुछ लड़कियों के विरोध और समाज में आगे बढ़कर पढ़ाई-लिखाई करने की इच्छा की वजह से इस परंपरा के पालन में एक हद तक कमी आई है। जागरूकता आने से लोगों ने इसे पहनना कुछ कम किया है।
'फैट इज सेक्सी', जुमला जो सर चढ़ के बोला
सेक्सी फिगर बोलते ही आपके जहन में सबसे पहले क्या आता है? एक छरहरी काया वाली स्त्री या फिर कोई मोटी स्त्री? दरअसल देशों की बात अगर ना करें, तो बीते कुछ समय में दुनिया में औरत की सुंदरता के मतलब को कई बार बदलते देखा गया।
कभी स्लिम-ट्रिम लड़की को सबसे फिट और सेक्सी का नाम दिया गया, तो कभी पूरी दुनिया ने माना कि जरूरत से ज्यादा चर्बी होना भी एक अलग तरह की मादकता है।
अपवादों को छोड़ दें तो हॉलीवुड-बॉलीवुड से लेकर फैशन की दुनिया तक स्लिम-ट्रिम को ही जगह मिलती है। यही अवधारणा आमतौर पर समाज में भी है, लेकिन ऐसा हर जगह नहीं है.
दक्षिण अफ्रीकी देश मॉरिटेनिया को ही लें। ये एक ऐसा देश है जहां अन्न की कमी है। लेकिन वहां मोटापे को ही खूबसूरत माना जाता है। लड़कियों को अगर बड़ा होने पर अच्छा घर और वर चाहिए, तो उसे जरूरत से ज्यादा वजनदार होना पड़ेगा। मॉरिटेनिया की 95 प्रतिशत महिलाएं खूब मोटी हैं।
बचपन से ही बदन में चर्बी जमा करने के मकसद से छोटी लड़कियों को जोर जबरदस्ती से दूध पिलाया जाता है। उन्हें कई लीटर दूध हर रोज पीना होता है। चाहे उल्टी हो या फिर पेट खराब, यहां तक की अगर वो रो भी दें फिर भी मां की तरफ से कोई सहानुभूति नहीं दिखाई जाती है।
कह सकते हैं कि इस देश की हर मां को बेटी के जवान होने से पहले उसे मोटा करने की जिम्मेदारी दी जाती है। मोटी औरत को अमीर ससुराल मिलना तय सा होता है।
इस रीति को मॉरिटेनिया के लोग गवाज कहते हैं। ये एक तरह की शारीरिक प्रताड़ना है लेकिन इस दौर से वहां की हर लड़की गुजरती है।
तेज दिमाग के भी दीवाने हजार
ब्यूटी विद ब्रेन यानी अक्ल वाली सुंदर स्त्रियों को तो हर जगह इज्जत दी गई है। रामायण की सीता, ट्रॉय की हेलन और क्लियोपैट्रा को काफी खूबसूरत माना गया है।
माना जाता है कि सीता सांवली थीं, लेकिन बेहद सुदंर और समझदार। इसलिए उन्हें खासा पसंद किया गया। क्लियोपैट्रा के लिए लिखा गया कि वो बहुत सुंदर नहीं थीं लेकिन उसका हाजिरजवाब होना और अक्ल की वजह से उनके कई चहेते बने।
ब्यूटी कॉन्टेस्ट के दौरान पूरी दुनिया ने देखा है कि ज्यूरी रंग से ज्यादा मॉडल की अक्ल को देखती है। नाओमी कैंपबेल दुनिया की नंबर वन मॉडल हैं। वो दक्षिण अफ्रीकी हैं लेकिन उनके फैंस दुनिया के हर हिस्से में हैं।
अमेरिका जैसी जगहों में तो बकायदा मोटी औरतों के लिए अलग से ब्यूटी कॉन्टेस्ट का आयोजन होता है। इसमें प्रतिभागियों को अपनी चाल-ढाल और अक्ल से जजों को साबित करना होता है कि वो खिताब के लिए सबसे सही दावेदार हैं।
भारत- सोलह श्रृगांर का देश
भारत एक ऐसा देश है जहां हर रंग-रूप और चेहरे के लोग आसानी से मिल जाएंगे। ज्यादातर आबादी सांवले रंग के लोगों की है। पूर्वी राज्यों के लोग नेपाली और चीनी जैसे दिखते हैं। जम्मू और पंजाब के लोग कई अरब देशों के लोगों से मिलते हैं तो दक्षिण भारतीय लोगों की त्वचा का रंग काली रंगत लिए हुए होता है।
भारत में स्त्री के लिए सोलह श्रृगांर की उपमा दी जाती है। शादीशुदा औरतों के लिए सिंदूर, कुमकुम, नथनी, बाली, बिछिया, काजल, चूड़ियां, मंगलसूत्र, मेंहदी, फूलों वाला जूड़ा, आदि। इन सब चीजों को अहम माना गया है।
पैरों में औरतों के बिछिया पहनने को सुहाग की निशानी माना जाता है। ये भी कहा जाता है कि बिछिया पहनने से जमीन से एक ऊर्जा औरत के गर्भाशय तक पहुंचती है जो उसे मां बनने में मदद करती है।
सही आकार के चेहरे- वैज्ञानिक तौर पर सुंदर
सुंदरता एक ऐसा विषय है जिसने वैज्ञानिकों को भी उलझन में डाला है। आखिर, सुंदर कौन है? ये जानने के लिए कई शोध किए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने बताया कि स्त्री का चेहरा अगर एक सुनहरे अनुपात यानी 'गोल्डन रेशियो' को पूरा करता है, तो फिर वो चेहरा 'सटीक सुंदरता' की श्रेणी में आता है।
उनके मुताबिक चेहरे की लंबाई चेहरे की चौड़ाई से 1.5 गुना ज्यादा होनी चाहिए। विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय बच्चन वैज्ञानिकों की इस 'गोल्डन रेशियो' वाली थ्योरी पर एकदम फिट बैठती हैं।
महारानी नेफरतिति और ग्रीस की कई मूर्तियां इस रेशियो के मुताबिक ही मानी जाती हैं।