हैरतअंगेज! पांच फुट की साइकिल पर 50 फुट के बांस!
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महज़ पांच फुट लंबी साइकिल पर 50 फुट के पांच-पांच बांस लादकर संतुलन बनाए रखना कितना कठिन होता है।
पर रतन बिस्वास इसमें माहिर हैं। मैंने जब उन्हें ऐसा करते हुए देखा, वे इन बांसों को त्रिपुरा की राजधानी अगरतला के बाज़ार में बेचने के लिए ले जा रहे थे। उनके गांव से बाज़ार की दूरी 17 किलोमीटर है।
अगर बांस के निकले हुए हिस्से किसी पत्थर से लग जाएं या किसी और चीज से टकरा जाएं तो रतन बिस्वास साइकिल समेत गिर सकते हैं, क्योंकि ये संतुलन बेहद नाज़ुक है।
बांसों में एक ख़ास गुण ये होता है कि ये देखने में जितने भारी लगते हैं उतने होते नहीं हैं।
रतन बिस्वास ने इन बांसों को साइकिल में मज़बूती से बांध रखा है, जो संख्या में पांच होने के बावजूद एक लगते हैं।
इन पांच बांसों का वज़न लगभग दो सौ किलोग्राम है और बिस्वास इस बात से वाकिफ हैं।
बांसों को लादकर साइकिल का संतुलन आप कैसे बना लेते हैं, वो भी इतने लंबे बांस? सवाल सुनकर वो थोड़ा मुस्कराते हैं और हमें लकड़ी की तख़्ती दिखाते हैं जो बांस की ही बनी है।
बिस्वास ने साइकिल के अगले हिस्से पर दो बांस के खड़े टुकड़े बांध रखे हैं। इन्हें उन्होंने साइकिल के डंडे से मज़बूती से बांध रखा है और दूसरी ओर बांस के दो टुकड़े बेड़े करके बांध रखे हैं। सहारा देने के लिए दो बांस के टुकड़े साइकिल के कैरियर से भी बंधे हैं।
मुश्किल डगर
इस तरह से वो बांसों को एक साथ बांधकर फिर उन्हें साइकिल के हत्थे से लेकर कैरियर तक बांधे रखते हैं। इससे ज़्यादा वज़न होने के बावजूद साइकिल का संतुलन नहीं बिगड़ता है।
पर बांसों को इस तरह लादकर सड़क पर चलना इतना आसान भी नहीं है. यह बहुत ही मुश्किल और मेहनत का काम है।
बिस्वास के लिए यह उनके कुछ उन कामों में से एक है, जो वो अपने परिवार के चार लोगों के पेट पालने के लिए करते हैं।
वो बताते हैं, “मेरे परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। हमारा गांव त्रिपुरा ज़िले के जिरानिया ब्लॉक में पड़ता है. मैं दैनिक मज़दूरी करता हूं वो भी जब काम मिलता है तब।”
बिस्वास बताते हैं कि काम न मिलने पर वो खेतों में मज़दूरी करते हैं या फिर मिट्टी के बर्तन बनाते हैं।
आश्चर्यजनक
बिस्वास ने जिन बांसों को साइकिल में बांध रखा है, उनका करीब एक चौथाई हिस्सा साइकिल के आगे निकला हुआ है। एक हिस्सा साइकिल से बंधा हुआ है जबकि एक बड़ा हिस्सा साइकिल के पीछे निकला हुआ है।
हम अब भी ये नहीं समझ पा रहे थे कि ये लचीला हिस्सा ज़मीन को कैसे नहीं छू रहा है। हमारे इस तरह चौंकने पर बिस्वास हँस पड़ते हैं।
वो कहते हैं, “मैं बांसों को खुद नहीं काटता। यह और भी कठिन होता है। मैं इन्हें उन लोगों से ख़रीदता हूं जो इसे बेचने के लिए हमारे गांव लाते हैं।”
बिस्वास यदि इन सभी बांसों को बाज़ार में बेच लेते हैं तो उन्हें दो सौ रुपए का फ़ायदा होगा।
मेरे साथ चल रहे त्रिपुरा विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्राध्यापक सुनील कलाई मुझे बताते हैं कि बाज़ार तक आने के कुछ छोटे रास्ते भी हैं।
लेकिन बिस्वास इसलिए इस चौड़ी सड़क से आ रहे हैं ताकि बांसों को लेकर चलने में कोई दिक्कत न हो।
हम अपनी कार में बैठकर अंबासा चल पड़े. दूसरी ओर, बिस्वास अपनी साइकिल लेकर चलने लगे, जिस पर करीब पचास फीट लंबी बांस की पूंछ लटक रही थी।