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अब बगैर ऑपरेशन के काम करेगा प्रोस्थेटिक हाथ, आठ लोगों पर सफल हुआ है ट्रायल

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 18 Feb 2018 03:25 AM IST
Prosthetic hand successful on eight people, no operation needed
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किसी दुर्घटना के चलते हाथ गंवा देने वाले लोगों के लिए राहत की खबर है। अभी तक चिकित्सा जगत में ऐसे लोगों को हाथ प्रत्यारोपण के जरिए प्रोस्थेटिक हाथ लगाने की सुविधा मिलती है। लेकिन जल्द ही प्रोस्थेटिक हैंड के लिए ऑपरेशन या प्रत्यारोपण की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक ईजाद की है जिसमें नसों पर सेंसर लगने के बाद बगैर किसी ऑपरेशन प्रोस्थेटिक हाथ लगा दिया जाएगा। 
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बंगलुरू में चल रही कॉन्फ्रेंस में छाया प्रोस्थेटिक हैंड का खुमार

इसकी कलाई और अंगुलियां नसों पर लगे सेंसर के अनुसार कार्य करेंगी। अभी तक आठ लोगों पर इस तकनीक का सफल परीक्षण हो चुका है। जल्द ही इसे आईएसआई की मंजूरी के लिए भी भेजा जाएगा। बंगलुरू में चल रहे देश के सबसे बड़े फॉर्मा सम्मेलन में इस तकनीक को पेश कियाए जिसे रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की ओर से मेड इन इंडिया का सबसे बड़ा उदाहरण बताया।

अंगुलियों और हाथ की कलाई पर वैज्ञानिकों का नया शोध

नसों पर सेंसर लगने से हाथ की कलाई करती है काम


बता दें कि अभी तक एम्स और कोच्चि स्थित अमृता अस्पताल जैसे देश के चुनिंदा चिकित्सीय संस्थानों में ही हाथ का प्रत्यारोपण किया जाता है। डॉक्टरों के लिए एक प्रत्यारोपण में 14 से 16 घंटे का वक्त लगता है। साथ ही इसमें करीब 20 लाख रुपये तक का खर्चा भी आता है। यही वजह है कि ज्यादात्तर लोग इसका लाभ नहीं ले पाते हैं। भारत में पहली बार किसी विदेशी नागरिक का हाथ प्रत्यारोपण 8 अगस्त 2017 को कोच्चि में हुआ था।

इस तरह काम करेगा नया हाथ

मॉडल के बारे में वैज्ञानिक अक्षय सक्सैना ने बताया कि ये अपर आर्म ट्रांसप्लांट यानि हाथ प्रत्यारोपण का विकल्प है। चूंकि भारत में यह इलाज लाखों रुपये में होता है। इसलिए गरीबों को सस्ती सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ये शोध किया है। इसमें बगैर ऑपरेशन प्रोस्थेटिक हैंड लगा दिया जाएगा। साथ ही मरीज की नसों पर सेंसर लगाए जाएंगे। जिनकी सहायता से प्रोस्थेटिक हाथ काम करेगा।

बॉक्स: यहां से शुरू हुआ शोध

कुछ समय पहले इंजीनियर लेबरीन डीसा ने इस मॉडल पर काम किया था। जिसके बाद उनकी टीम में पांच और इंजीनियर ने मिलकर इस प्रोस्थेटिक हाथ को बनाना शुरू किया। बिहार की राजधानी पटना स्थित इनक्यूबेशन सेंटर आईआईटी की प्रयोगशाला में शोध को किया। सरकार की ओर से इस शोध पर करीब 10 लाख रुपये और प्रयोगशाला की सुविधा दशी गई है। अभी इस हाथ की पकड़ पर जांच पूरी हुई है। हालांकि मंजूरी मिलने के बाद ही इसकी कीमत तय हो सकती है। लेकिन कहा जा रहा है कि एक लाख रुपये तक इसकी कीमत होगी। 

एम्स के डॉक्टरों ने भी जांचा

इस नए शोध को वैज्ञानिकों ने रोबोबॉयोनिक्स का नाम दिया है। इसकी पूरी जांच दिल्ली के एम्स के विशेषज्ञों ने भी की है। अक्षय के मुताबिकए एम्स और आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों ने उनके मॉडल की जांच भी की है। फेलोशिप निदेशक डॉण् प्रभात झा की देखरेख में शोध पूरा किया है।

सरकारी मेडिकल कॉलेजों तक पहुंचेगा

बंगलुरू में मौजूद रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के कुछ अधिकारियों ने बताया कि ये मॉडल भारतीय चिकित्सा और मरीजों के लिए एक विकल्प के रुप में साबित होगा। सभी मानक पूरे करने के बाद इस तकनीक को सरकारी मेडिकल कॉलेजों तक में उपलब्ध कराया जाएगा। ताकि सरकारी खर्चे पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को विकलांगता के दलदल से बाहर निकाला जा सके। सूत्रों का कहना है कि करीब छह से आठ महीने के भीतर इस शोध की प्रक्रिया खत्म होगी और मंत्रालय इस पर काम शुरू करेगा।

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