EXCLUSIVE: सड़क किनारे बिकने वाले हेलमेट से क्यों अलग है STUDDS HELMET?
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STUDDS दुनिया की सबसे बड़ी हेलमेट बनाने वाली कंपनियों में से एक है, जिसके हेलमेट को दुनिया के 50 से अधिक देशों में खरीदा जाता है। आज हम इस सेगमेंट में आपको बताएंगे कि हेलमेट का EPS, Shell, Visior और Harness कैसे बनता है। इसके साथ जानेंगे कि वो कौन सी चीज है जो हेलमेट के वाइजर को स्क्रैच रेजिस्टेंट बनाती है। इसके अलावा जानेंगे कि हेलमेट की पेंटिंग कितने राउंड में होती है और इसे कैसे डिजाइन करते हैं। इन सब चीजों को जानने के लिए हम STUDSS के फरीदाबाद मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में गए, जहां एक दिन में कंपनी करीब 24,000 हेलमेट्स बनाती है। नीचे वीडियो में देखें कैसे बनता है हेलमेट
ईपीएस (EPS)
EPS यानी कि Expanded Polystyrene हेलमेट का सबसे अहम हिस्सा होता है। यह EPS ही होता है जो हादसों के दौरान आपके सिर की सुरक्षा करता है। अब सवाल यह है कि ये बनता कैसे है? तो सबसे पहले इसके छोटे-छोटे दानों को प्री-एक्सपेंडर मशीन में डालते हैं। यहां EPS की डेंसिटी को सेट किया जाता है। इसके बाद इस चैंबर में गर्म भांप डाली जाती है, जिसके चलते EPS के छोटे-छोटे कण फैलने लगते हैं।
इसके बाद EPS को आखिरी शेप देने के लिए इसे इंजेक्शन मोल्डिंग मशीन में डाला जाता है। इस मशीन में दिए गए साचों को डाइस कहते हैं। सबसे पहली प्रक्रिया में इन साचों में EPS को भरा जाता है जिसे इजेक्शन कहते हैं। दूसकी प्रक्रिया में EPS को भांप के जरिए पिघलाया जाता है और फिर इसे फ्यूज करते हैं। इसके बाद जब EPS शेप में ढल जाता है, तो उसे ठंडा करते हैं। इसके बाद मशीन खुलती है और EPS बाहर आ जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में करीब 100 से 120 सेकेंड्स का समय लगता है। EPS जब बन कर बाहर आता है तब उसे क्वालिटी चेक से गुजरना पड़ता है। जहां वजन से लेकर कई पैमानों पर उसकी टेस्टिंग होती है।
शेल
शेल हेलमेट का बाहरी हिस्सा होता है, जो ABS से बनाया जाता है। ABS को एक्रिलोनाइट्रिल ब्यूटाडाइन स्टाइरिन कहते हैं। यह एक तरह का खास प्लास्टिक होता है, जो हेलमेट को बाहर से काफी सख्त बनाता है। हेलमेट के शेल को EPS की तरह ही बनाया जाता है। ABS के छोटे-छोटे टुकड़ों को हौकर के जरिए इंजेक्शन मोल्डिंग मशीन में पहुंचाया जाता है। यहां गर्म तापमान पर ABS को पिघलाया जाता है। इसके बाद पिघला हुआ ABS साचों में जाता है, जहां पर उसे ठंडा किया जाता है। इसके बाद ऑटोमैटेड मशीन इसे बाहर निकाल लेती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में करीब 100 से 140 सेकेंड्स तक का समय लगता है।
वाइजर
हेल्मेट का तीसरा सबसे अहम हिस्सा होता है वाइजर, जिसे आम भाषा में हेलमेट के सामने लगा शीशा भी कहा जा सकता है। इसे बनाने के लिए Polycarbonate के छोटे-छोटे दानों को मशीन में डाला जाता है। Polycarbonates, थर्मोप्लास्टिक पॉलिमर्स का एक हिस्सा है। इसका इस्तेमाल मजबूत और ट्रांसपैरेंट चीजों को बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऑटोमैटेड मशीन में वाइजर बन कर बाहर आता है, जहां इसकी क्वालिटी चेकिंग होती है।
वाइजर के बनने के बाद अब इसकी एंट्री-स्क्रैच कोटिंग होती है। वाइजर को 7 से 8 स्टेज में साफ किया जाता है। इन राउंड्स में वाइजर की डिमिनरलाइज्ड वॉटर से अल्ट्रॉवायलेट क्लिनिंग तक होती है। इसके बाद इसकी सिलिकॉन कोटिंग होती है। इसके बाद इन वाइजर को 130 डिग्री पर बेक किया जाता है।
डिजाइनिंग
हेलमेट की डिजाइनिंग की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है डिकेल्स का। डिकेल्स को आप आसान भाषा में स्टीकर भी कह सकते हैं। STUDDS के मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में रिफ्लेक्टिव, विनाइल और डोम के साथ वाटर ट्रांसफर डिकेल्स लगाए जाते हैं। वाटर ट्रांसफर डिकेल्स में हेल्मेट्स पर स्टीकर्स को पानी में डाल कर लगाया जाता है। पानी में डालते ही ये डिकेल्स एक्टिवेट हो जाते हैं। इसके बाद इन्हें हेलमेट पर लगाया जाता है। 'वाटर ट्रांसफर डिकेल्स' सरफेस टेंशन के कारण हेलमेट पर चिपक जाते हैं जबकि, अगर नॉर्मल विनाइल स्टीकर्स की बात करें तो इनमें एडेसिव लगा होता है जिससे इनके कवर को निकाल कर सीधे हेलमेट पर लगा दिया जाता है।
पेंट
STUDDS के हेलमेट पर तीन राउंड में पेटिंग होती है। पहले राउंड में मैनुअली बेस पेटिंग होती है। इसके बाद 4 से 6 घंटे रुकने के बाद हेलमेंट पर स्टीकर्स लगाए जाते हैं। इसके बाद 4 से 6 घंटों तक के लिए हेलमेट को सूखने के लिए रखा जाता है, जिसके बाद इस पर टॉप कोटिंग की जाती है। टॉप कोटिंग भी दो तरह की होती है। पहली मैट और दूसरी ग्लॉसी।
असेंबलिंग
सबसे आखिर में आता है असेंबलिंग सेक्शन में जहां हेलमेट के शेल को पहले काउंटर पर भेजा जाता है। इसके बाद शेल के अंदर EPS, हार्नेस, वाइजर से लेकर दूसरे समाना फिट किए जाते हैं। इसके बाद हेलमेट का रिव्यू होता है औ फिर इसकी पैकिंग होती है।