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भारतीय नहीं देते हैं कार की सुरक्षा पर ध्यान, इन देशों से हैं हम 20 साल पीछे

Fri, 10 Aug 2018 04:20 PM IST
ऑटो डेस्क, अमर उजाला
ऑटो डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 10 Aug 2018 04:20 PM IST
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Acc to ncap reports , india is 20 years behind from 5 star standards

यूरोपियन न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम ने टाटा की एसयूवी नेक्सन को भारत में बनी अब तक की सबसे सुरक्षित गाड़ी बताया है। इससे पहले कई कीमती कारों को इसी टेस्ट में क्रैश टेस्ट के दौरान फेल कर दिया गया। ग्लोबल एनकैप के चेयरमैन मैक्स मोसले की मानें तो भारत अब छोटी कारों की बिक्री और उत्पादन का बड़ा वैश्विक बाजार बन चुका है। इसलिए सुरक्षा का यह स्तर बहुत चिंताजनक है। यह यूरोप व उत्तरी अमेरिका के सामान्य 5 स्टार मानकों से करीब 20 साल पीछे है।

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उनका मानना है कि गाड़ी के ढांचे में कमजोरी होने और एयरबैग नहीं होने से भारतीय ग्राहकों की जिंदगी पर जोखिम बना हुआ है। हमारे देश में सस्ती कारों को तवज्जो दी जाती है। सस्ती कार बनाने के लिए कंपनियां सुरक्षा मानकों से समझौता कर लेती हैं।
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जिस कार में ज्यादा सुरक्षा फीचर होते हैं, उसकी लागत ज्यादा आती है। ऐसी कारें महंगी होने से कम बिकती हैं। भारत सस्ती कारों का बड़ा बाजार है। कई विदेशी कंपनियों ने भी भारत में सस्ती कारें उतारी हैं। 
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भारत में कार खरीदते समय ग्राहक माइलेज पर बहुत ध्यान देता है। जिस गाड़ी का माइलेज ज्यादा होता है, वे ज्यादा बिकती है। कार का माइलेज ज्यादा निकले इस कारण उसका वजन कम रखना पड़ता है। वजन कम रखने के लिए आजकल कारों में फाइबर मटेरियल का ज्यादा इस्तेमाल होने लगा है। 

कारों में सुरक्षा मानकों को लेकर हमारे देश में स्पष्ट नीति नहीं है। इस कारण निर्माता सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखते हैं। जो मानक जरूरी हैं सिर्फ उन्हें ही वाहनों में लगाया जाता है। एयरबैग और एंटी लॉक ब्रेकिंग सिस्टम का प्रयोग सिर्फ महंगी गाड़ियों में हो रहा है। भारत सरकार 2017 से वाहन सुरक्षा के मुद्दे पर काफी ठोस कदम उठा रही है।

भारत में हर साल हो रहा है बिक्री में इजाफा

Acc to ncap reports , india is 20 years behind from 5 star standards

वर्ष 2017-18 में हुई कार सेल्स के आंकड़ाें के अनुसार, पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा कारों ने सड़कों पर दस्तक दी। हालांकि मेट्रो शहरों में इनकी संख्या गिरी है, जिसकी एक बड़ी वजह पार्किंग स्पेस रहा। छोटे नगरों कस्बों में वाहनों की बढ़ती मांग तथा उपयोगिता वाहनों की बढ़ी लोकप्रियता के बीच मार्च को समाप्त बीते वित्त वर्ष में देश में यात्री वाहनों की बिक्री रिकार्ड रही।

पिछले साल में 7.89% बढोतरी के साथ लगभग 33 लाख वाहन बिके हैं। भारतीय वाहन विनिर्माताओं के संगठन सियाम के द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार वित्तवर्ष 2017-18 में यात्री वाहनों की घरेलू बिक्री 32,87,965 इकाई रही जो पूर्व वित्त वर्ष (30,47,582 वाहन) की तुलना में 7.89% अधिक है। 

दरअसल यूरोपियन न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी। यूरो एनकैप का काम है नई−नई कारों को तोड़ना। जी हां, कारों की मज़बूती उन्हें तोड़कर ही तो जांची जा सकती है, वहीं इस टेस्ट के तहत नई कारों को क्रैश-टेस्ट किया जाता है।

यह जानने के लिए कि वे कितनी सेफ हैं - ड्राइवर, पैसेंजर और यहां तक कि पैदल यात्रियों के लिए भी। इन्हीं पैमानों पर आमतौर पर पैसेंजर कारों और SUV का क्रैश टेस्ट होता है। जिसके तहत कारों को अलग-अलग एंगल से क्रैश किया जाता है। सभी टेस्ट क्रैश लैब में किए जाते हैं। ताकि टक्कर से जुड़े सभी आंकड़े रिकॉर्ड किए जा सकें।

इन पैमाने पर होता है टेस्ट

  • फ्रंटल इम्पैक्ट, यानि सीधी टक्कर, जिसमें कार जाती है 64 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से और टकराती है अपने बराबर के वज़न वाले एक ढांचे से। 
  • साइड इम्पैक्ट (यानि साइड की टक्कर का टेस्ट)।
  • पोल इम्पैक्ट (यानि खंभे या पेड़ से टक्कर) टेस्ट।
  • पेडेस्ट्रियन प्रोटेक्शन जिसमें जांचा जाता है कि अगर कार किसी पैदल यात्री से टकरा जाए तो उन्हें कितना नुकसान पहुंचेगा। 

 टाटा की एसयूवी नेक्सन को भले ही एनकैप टेस्ट में पास कर दिया गया हो, लेकिन इससे पहले कई भारतीय कारें पूरी तरह से असफल साबित हुई हैं। पिछले कुछ सालों से अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारतीय कारों का क्रैश टेस्ट कर रही हैं। 

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