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Ram Mandir Bhumi Pujan: वास्तु में भवन निर्माण से पहले क्यों किया जाता है भूमि पूजन, जानिए भूमि वंदना से जुड़े अनेक रहस्य
Wed, 05 Aug 2020 11:32 AM IST
विनोद शुक्ला
अनीता जैन, वास्तुविद
अनीता जैन, वास्तुविद
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 05 Aug 2020 11:32 AM IST
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Ayodhya Ram Mandir Bhoomi Pujan
- फोटो : amar ujala
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Ayodhya Ram Mandir Bhoomi Pujan Updates: आज अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए मंदिर भूमि पूजन कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। बचपन से ही हम अपने घरों में देखते आए हैं कि हमारे बड़े-बुजुर्ग सुबह सोकर उठते ही सबसे पहले भूमि को छूकर प्रणाम करते हैं। इसका कारण है कि शास्त्रों में पृथ्वी की वंदना, माँ कहकर की गई है। अतः यह आदरणीय हैं। धरती ही हमें अन्न, जल, वस्त्र, औषधियां, खनिज पदार्थ, समस्त धातुएं, फल-सब्जियां सभी कुछ प्रदान करती है, जिससे हमारा जीवन चलता है, इसलिए हम सब धरती माता के ऋणी हैं। शास्त्रों में इस रीति को विधान बनाकर धार्मिक रूप इसलिए दिया ताकि हम धरती माता के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर सकें,उन्हें सम्मान दे सकें।
मन्त्र जप कर पैर रखें-
माता के समान पूज्यनीय होने से भूमि पर पैर रखना भी दोष का कारण माना गया है, पर भूमि स्पर्श से तो कोई अछूता नहीं रह सकता। यही कारण है कि शास्त्रों में उस पर पैर रखने की विवशता के लिए एक विशेष मंत्र के द्वारा क्षमा प्रार्थना जरूरी मानी गई है।
समुद्र-वसने देवि, पर्वत-स्तन-मंडिते ।
विष्णु-पत्नि नमस्तुभ्यं, पाद-स्पर्शं क्षमस्व मे ॥
अर्थात समुद्र रुपी वस्त्र धारण करने वाली पर्वत रुपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी हे माता पृथ्वी! आप मुझे पाद स्पर्श के लिए क्षमा करें।
वास्तु में भी है भूमि पूजन का बड़ा स्थान
वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन निर्माण के बाद उसकी सुख-शांति एवं भव्यता बनाए रखने के लिए भवन निमार्ण करने से पूर्व भवन की नींव खोदकर धरती माँ का पूजन किया जाता है। विशेष मन्त्रों के द्वारा माँ भूमि से प्रार्थना की जाती है कि हे माँ! हम आपके ऊपर भार डाल रहें हैं,उसके लिए आप हमें क्षमा करें। नींव में भी चांदी या सोने का सर्प रखा जाता है,इसके पीछे पौराणिक मान्यता है कि हमारी पृथ्वी सर्प के फन पर टिकी हुई है।और ये भी माना जाता है कि जमीन के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं।
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श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवें स्कंद में लिखा है कि पृथ्वी के नीचे पाताललोक है और इसके स्वामी शेषनाग है, इसलिए कभी भी,किसी भी स्थान पर नीव पूजन/भूमि पूजन करते समय चांदी के नाग का जोड़ा रखा जाता हैं |जैसे शेषनाग अपने फन पर संपूर्ण पृथ्वी को धारण किए हुए हैं ठीक उसी प्रकार मेरे इस भवन की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फन पर पूर्ण मजबूती के साथ स्थापित रहे। क्योंकी शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वाहन कर शेषनाग को बुलाया जाता है ताकि वे साक्षात उपस्थित होकर भवन की रक्षा वहन करें।
भूमि वंदना के अनोखे रूप
वास्तव में भूमि वन्दना के पीछे यदि वैज्ञानिक कारण की ओर दृष्टि डाली जाए तो अनेक शोध बताते हैं कि जब हम कोई कम्बल या चादर ओढ़कर सोते हैं तो हमारे शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है, ऐसे में बिस्तर से नीचे एकदम पैर रख देने से शरीर में गर्मी-सर्दी का प्रवाह हो जाता है ,जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। व्यवहारिक दृष्टि से भूमि वंदना इंसान को ज़मीन से जुड़े रहकर अहंकार से परे हटाकर सहनशील ,धैर्यवान और क्षमाशील जीवन जीने का सन्देश देती है ।
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मन्त्र जप कर पैर रखें-
माता के समान पूज्यनीय होने से भूमि पर पैर रखना भी दोष का कारण माना गया है, पर भूमि स्पर्श से तो कोई अछूता नहीं रह सकता। यही कारण है कि शास्त्रों में उस पर पैर रखने की विवशता के लिए एक विशेष मंत्र के द्वारा क्षमा प्रार्थना जरूरी मानी गई है।
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समुद्र-वसने देवि, पर्वत-स्तन-मंडिते ।
विष्णु-पत्नि नमस्तुभ्यं, पाद-स्पर्शं क्षमस्व मे ॥
अर्थात समुद्र रुपी वस्त्र धारण करने वाली पर्वत रुपी स्तनों से मंडित भगवान विष्णु की पत्नी हे माता पृथ्वी! आप मुझे पाद स्पर्श के लिए क्षमा करें।
वास्तु में भी है भूमि पूजन का बड़ा स्थान
वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन निर्माण के बाद उसकी सुख-शांति एवं भव्यता बनाए रखने के लिए भवन निमार्ण करने से पूर्व भवन की नींव खोदकर धरती माँ का पूजन किया जाता है। विशेष मन्त्रों के द्वारा माँ भूमि से प्रार्थना की जाती है कि हे माँ! हम आपके ऊपर भार डाल रहें हैं,उसके लिए आप हमें क्षमा करें। नींव में भी चांदी या सोने का सर्प रखा जाता है,इसके पीछे पौराणिक मान्यता है कि हमारी पृथ्वी सर्प के फन पर टिकी हुई है।और ये भी माना जाता है कि जमीन के नीचे पाताल लोक है और इसके स्वामी शेषनाग हैं।
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श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवें स्कंद में लिखा है कि पृथ्वी के नीचे पाताललोक है और इसके स्वामी शेषनाग है, इसलिए कभी भी,किसी भी स्थान पर नीव पूजन/भूमि पूजन करते समय चांदी के नाग का जोड़ा रखा जाता हैं |जैसे शेषनाग अपने फन पर संपूर्ण पृथ्वी को धारण किए हुए हैं ठीक उसी प्रकार मेरे इस भवन की नींव भी प्रतिष्ठित किए हुए चांदी के नाग के फन पर पूर्ण मजबूती के साथ स्थापित रहे। क्योंकी शेषनाग क्षीरसागर में रहते हैं इसलिए पूजन के कलश में दूध, दही, घी डालकर मंत्रों से आह्वाहन कर शेषनाग को बुलाया जाता है ताकि वे साक्षात उपस्थित होकर भवन की रक्षा वहन करें।
भूमि वंदना के अनोखे रूप
- साष्टांग प्रणाम(भूमि पर सीधे लेटकर प्रणाम करना )धरती माता का अभिनन्दन करना ही है ।
- कोई भी पूजा-अनुष्ठान आरम्भ करने से पहले उस जगह को धोकर ,जल छिडककर,मांडना बनाकर मूर्ति,कलश,दीपक या पूजा की थाली रखी जाती है।
- स्टेज पर कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करने से पूर्व धरती को छूकर प्रणाम करते हैं । मंदिर में प्रवेश करने से पहले भी धरती को छूकर आर्शीवाद लिया जाता है। कहीं-कहीं तो आज भी बच्चे को नया वस्त्र पहनाने से पहले कपड़े को धरती से स्पर्श करवाया जाता है। यह सब धरती माँ की मानसिक पूजा का ही एक रूप है।
- किसानों के द्वारा उत्तम फसल की प्राप्ति के लिए फसल बोने से पूर्व धरती पूजन किया जाता है।
- नए घर में प्रवेश करने से पूर्व देहली की पूजा अवश्य की जाती है । विवाह के समय भी नई बहू के द्वारा रोली,चावल,फल-मिठाई आदि से देहली की पूजा करवाई जाती है ।
- पुराने समय में घरों में गृहिणी सुबह उठते ही घर,मुख्य द्वार को झाड़-बुहार कर जल से धोकर चौक पूरती थीं । कहीं-कहीं तो आज भी हमारे बड़े-बुज़ुर्ग घर से बाहर जाते वक्त बड़ी ही श्रद्धा से धरती को स्पर्श कर प्रणाम करते हैं।
वास्तव में भूमि वन्दना के पीछे यदि वैज्ञानिक कारण की ओर दृष्टि डाली जाए तो अनेक शोध बताते हैं कि जब हम कोई कम्बल या चादर ओढ़कर सोते हैं तो हमारे शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है, ऐसे में बिस्तर से नीचे एकदम पैर रख देने से शरीर में गर्मी-सर्दी का प्रवाह हो जाता है ,जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। व्यवहारिक दृष्टि से भूमि वंदना इंसान को ज़मीन से जुड़े रहकर अहंकार से परे हटाकर सहनशील ,धैर्यवान और क्षमाशील जीवन जीने का सन्देश देती है ।