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शनि जयंती: शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करने के पीछे क्या है मान्यता

Mon, 03 Jun 2019 04:12 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 03 Jun 2019 04:12 PM IST
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shani jayanti 2019 puja vidhi: why people offer oil during shani puja
शनिदेव

3 जून को शनि जयंती है। हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ महीने की अमावस्या पर भगवान शनि देव का जन्म हुआ था। ज्योतिष में शनि को सभी ग्रहों में विशेष स्थान प्राप्त है। कुंडली में शनिदोष दूर करने और शनि की कृपा पाने के लिए लोग शनिवार, अमावस्या और शनि जयंती पर तेल चढ़ाया जाता है। शनि देव को तेल चढ़ाने का परंपरा काफी पुरानी है। ऐसा कहा जाता है जो व्यक्ति शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाते हैं उन्हें तमाम परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है।  शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने के पीछे ज्योतिष और धार्मिक मान्यता जुड़ी है। 

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 तेल चढ़ाने का ज्योतिष से संबंध
ज्योतिष के अनुसार सभी 9 ग्रहों का संबंध मनुष्य के शरीर के अलग- अलग अंगो से होता है।  शरीर के हर अंग का कारक अलग-अलग ग्रह होते हैं। शनि ग्रह स्किन, दांत, कान, हड्डियां और घुटनों के कारक ग्रह हैं। कुंडली में शनि के अशुभ होने पर शरीर के इन अंगों पर बीमारियां कब्जा जमा लेती हैं। शनि को शनिवार के दिन तेल अर्पित करने और  शरीर पर सरसों के तेल की मालिश करने से फायदा मिलता है।
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शनि जयंती के अवसर पर शनि दोष निवारण पूजा (03 जून 2019, सोमवार)

तेल अर्पित करने का धार्मिक मान्यता
शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने के पीछे एक प्रचलित कथा है। जिसके अनुसार एक बार शनिदेव को अपनी ताकत पर अभिमान हो गया था। शनिदेव हर किसी पर अपनी अशुभ दृष्टि डालने लगे थे। अपने बल के घमंड से उन्होंने हनुमानजी को युद्ध के लिए ललकारा। लेकिन उस समय हनुमानजी अपने प्रभु राम की सेवा भक्ति में लीन थे। उन्होंने युद्ध करने से मना कर दिया। लेकिन शनिदेव नहीं माने और दोबारा युद्ध के लिए ललकारा। मना करने के बाद जब शनिदेव नहीं माने तो हनुमानजी नें शनिदेव को अपनी पूंछ में बांधकर बुरी तरह से परास्त किया। इसके बाद शनिदेव को अपनी गलती पर एहसास हुआ। युद्ध में हनुमानजी से लड़ते हुए उनका शरीर बुरी तरह से चोटों से छिल गया था। शनि के हनुमानजी से क्षमा मांगने पर हनुमानजी ने शनि को शरीर पर लगाने के लिए तेल दिया। तेल लगाते ही शनिदेव का दर्द दूर हो गया। तभी से शनिदेव को तेल अर्पित करने की परंपरा प्रारंभ हुई। शनिदेव ने हनुमानजी से माफी मांगते हुए यह वचन किया कि जो भक्त आपकी आराधना करेगा उस पर शनिदोष नहीं लगेगा।

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