भगवान श्री गणेश जी के जन्म से जुड़ी हुई कथा के अनुसार एक बार देवी पार्वती ने उबटन से एक बालक का निर्माण किया। देवी पार्वती ने सोचा कि क्यों न इसे जीवित कर दिया जाए। देवी पार्वती ने बालक की मूर्ति में प्राण डाल दिया और इसे अपना पुत्र मान लिया।
देवी पार्वती ने अपने इस पुत्र को परमशक्तिशाली और बुद्घिमान होने का आशीर्वाद दिया। जब यह घटना हुई उस समय भगवान शिव कैलाश से बाहर गए हुए थे। इसलिए उन्हें अपने इस पुत्र के जन्म की जानकारी नहीं थी। जब भगवान शिव कैलाश लौटकर आए तब अपनी गुफा के द्वार पर एक बालक गणेश को खड़ा पाया।
गणेश जी ने भगवान शिव के गुफा में प्रवेश करने से रोक दिया। इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए। फिर तो देवताओं और गणेश जी के बीच भयानक युद्घ छिड़ गया। अंत में भगवान शिवे ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया।
जिसके बाद देवी पार्वती के क्रोध के कारण गणेश जी के धड़ से हाथी का सिर जोड़ा गया और गणेश जी को भगवान शिव ने भी अपना पुत्र स्वीकार कर लिया। जन्म के कुछ समय के बाद ही गणेश जी को पिता से संघर्ष करना पड़ा और बाद में पिता के सबसे दुलारे और जगत में पूजनीय हो गए। यह सब हुआ उनके जन्म समय के कारण जिसे गणेश जी की जन्मपत्री से जाना जा सकता है।
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