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स्वरोजगार के दावों के बीच जंगलों में सड़ रही भेड़ पालकों की ऊन, तीन साल से नहीं मिला खरीदार

घनसाली। प्रदेश सरकार जहां ग्रामीणों को पशुपालन और स्वरोजगार से जोड़ने के दावे कर रही है, वहीं टिहरी के सीमांत भिलंगना क्षेत्र में भेड़ पालकों की मेहनत से तैयार होने वाली ऊन का कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। हालात यह हैं कि मेड़, मारवाड़ी, निवालगांव, गंगी, गेंवाली, उरणी और पिनस्वाड़ समेत कई गांवों में भेड़-बकरियों से निकाली गई कई टन ऊन जंगलों में ही सड़ रही है। भिलंगना क्षेत्र के सीमांत गांवों में बड़ी संख्या में ग्रामीण परंपरागत रूप से भेड़-बकरी पालन करते हैं। यही पशुपालन कई परिवारों की आजीविका और स्वरोजगार का प्रमुख साधन है। लेकिन ऊन की कटाई के बाद उसके उचित विपणन, खरीद और प्रसंस्करण की व्यवस्था नहीं होने से भेड़ पालकों की मेहनत बेकार जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि ऊन को बेचने के लिए स्थानीय स्तर पर न तो पर्याप्त बाजार है और न ही कताई-बुनाई की कोई प्रभावी व्यवस्था। तीन साल से नहीं बिकी ऊन, जंगलों में छोड़ने को मजबूर स्थानीय ग्रामीण विमला देवी ने बताया कि गांव में बड़े स्तर पर भेड़ पालन किया जाता है, लेकिन पिछले करीब तीन वर्षों से ऊन की बिक्री नहीं हो पा रही है। ऊन को संभालकर रखने के बावजूद जब कोई खरीदार नहीं मिलता तो पशुपालकों के सामने उसे जंगल में छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। उन्होंने सरकार से क्षेत्र में ऊन के लिए उचित विपणन केंद्र स्थापित करने और उसके संचालन में स्थानीय लोगों को रोजगार देने की मांग की है। ग्राम प्रधान संतोषी देवी ने कहा कि ग्रामीण भेड़ पालन को स्वरोजगार के रूप में अपना रहे हैं, लेकिन ऊन का कोई खरीदार नहीं होने से उन्हें इसका आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऊन बैंक और विपणन केंद्र की उठी मांग निवालगांव के पूर्व प्रधान बावन सिंह बिष्ट ने कहा कि क्षेत्र में ऊन का उत्पादन बड़े स्तर पर होता है, लेकिन उसके विपणन की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। सरकार की ओर से भेड़ पालकों के लिए कई घोषणाएं और वादे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पाई है। उन्होंने बताया कि कुछ समय पहले कैबिनेट मंत्री भरत चौधरी के क्षेत्र भ्रमण के दौरान भी उन्होंने भेड़ पालकों की समस्या उनके सामने रखी थी। उन्होंने क्षेत्र में वूल बैंक (ऊन बैंक) स्थापित करने के साथ ही ऊन के विपणन की व्यवस्था किए जाने की मांग की थी। बावन सिंह बिष्ट ने कहा कि पड़ोसी जनपद उत्तरकाशी की ऊन को भी बाहर के बाजारों तक पहुंचाया जा रहा है, जबकि भिलंगना क्षेत्र के पशुपालक अपनी ऊन को बेचने के लिए परेशान हैं। उनका कहना है कि भेड़ पालकों को प्रोत्साहन देने की बातें तो होती हैं, लेकिन ऊन की खरीद और प्रसंस्करण की व्यवस्था नहीं होने से स्वरोजगार का यह साधन संकट में है। सीडीओ ने लिया संज्ञान, स्थानीय स्तर पर मशीनें लगाने की तैयारी वहीं क्षेत्र भ्रमण के दौरान टिहरी की सीडीओ वरुणा अग्रवाल के सामने भी भेड़ पालकों ने ऊन की समस्या रखी। सीडीओ ने कहा कि क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग भेड़ पालन कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपनी ऊन का उचित दाम नहीं मिल पा रहा है। स्थिति यह है कि कई पशुपालकों ने ऊन की कटाई करने के बाद उसे जंगलों में ही छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने मामले का संज्ञान लिया है और स्वरोजगार के माध्यम से स्थानीय स्तर पर ऊन से धागा तैयार करने के लिए आवश्यक मशीनें स्थापित करने की दिशा में कार्य किया जाएगा। इससे ऊन को स्थानीय स्तर पर ही प्रसंस्कृत करने और ग्रामीणों को रोजगार से जोड़ने में मदद मिलने की उम्मीद है। अब ग्रामीणों की निगाह प्रशासन की इस पहल पर टिकी है। यदि क्षेत्र में ऊन की खरीद, प्रसंस्करण और विपणन की स्थायी व्यवस्था बनती है तो वर्षों से उपेक्षित भेड़ पालन को नया बाजार मिलने के साथ ही सीमांत गांवों के ग्रामीणों के लिए स्वरोजगार का मजबूत माध्यम तैयार हो सकता है।

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