बंगापानी (पिथौरागढ़)। कंधे पर बस्ता, आंखों में सपने और सिर पर हर पल मौत का सामा... यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि पिथौरागढ़ के मनकोट गांव के बच्चों की रोजमर्रा की हकीकत है। स्थायी पुल के अभाव में ये छात्र-छात्राएं उफनाई गोरी नदी को गरारी के सहारे पार कर स्कूल पहुंचते हैं। एक छोटी सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है, लेकिन मजबूरी यह है कि डर से बड़ा उनका भविष्य और गांव को बेबसी है। मुनस्यारी विकासखंड के मनकोट में करीब 20 परिवार रहते हैं। यहां कक्षा पांच तक की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल है। कक्षा छह से आठ तक की पढ़ाई के लिए बच्चों को गोरी नदी पार कर करीब पांच किलोमीटर दूर जूनियर हाईस्कूल छोरीबगड़ जाना पड़ता है। उसके बाद माध्यमिक शिक्षा के लिए करीब आठ किमी दूर जीआईसी मवानी-दवानी जाने की मजबूरी है। ऐसे में हर दिन कक्षा छह से 12 तक के करीब 10 बच्चों को 60 मीटर चौड़ी उफनती गोरी नदी को गरारी के सहारे पार करना पड़ता है। यहां के लोग करीब 40 साल से इसी गरारी के सहारे आवागमन कर रहे हैं। ग्रामीण मोहन सिंह, दान सिंह, कुंदन सिंह, उमेश सिंह आदि का कहना है कि यहां पर पुल बनाने की मांग वर्षों से उठ रही है। हर बार वादे और दावे किए जाते हैं। उन्होंने बताया कि गरारी की चेन टूटने से कई बार दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और लोग घायल हो चुके हैं।