गढ़वाल और कुमाऊं की पहाड़ियों पर मिलने वाली औषधीय झाड़ी किनगोड़ (बरबेरीस एरिस्टाटा) का अस्तित्व संकट में है। यह झाड़ी मुख्य रूप से 1700 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर चोपता, टिहरी, अगस्त्यमुनि, पौड़ी, नैनीताल और पिथौरागढ़ जैसे इलाकों में पाई जाती है। स्थानीय लोग इसे गढ़वाल में किनगोड़ और कुमाऊं में किलमोड़ा कहते हैं। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर के वानिकी एवं प्राकृतिक संसाधन विभाग में डॉ. जितेंद्र बुटोला के निर्देशन में इस पौधे पर किया जा रहा अध्ययन बताता है कि यह जड़ी-बूटी न केवल औषधीय दृष्टि से अमूल्य है, बल्कि जंगल की पारिस्थितिकी को भी संतुलित रखती है। किनगोड़ के नाम से जानी जाने वाली यह झाड़ी बर्बेरिन नामक औषधीय तत्व से भरपूर है, जिसकी मांग हिमालया वेलनेस, पतंजलि और अन्य औषधि निर्माण कंपनियों में लगातार बनी हुई है। परंतु इसकी खेती या संगठित रोपण न होने के कारण जंगल ही इसका एकमात्र स्रोत हैं, जिससे इस पर अत्यधिक दबाव बढ़ रहा है। डॉ. बुटोला बताते हैं कि उत्तराखंड में किनगोड़ की लगभग पांच प्रजातियाँ पाई जाती हैं, लेकिन पहचान के अभाव में जंगलों से सभी को एक साथ काटा जा रहा है। इससे वह विशिष्ट प्रजाति, जिसमें औषधीय तत्व सबसे अधिक हैं, धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। उनकी अनुसंधान टीम किनगोड़ की मिट्टी, ढलान, जलवायु और बीजों की अंकुरण क्षमता पर अध्ययन कर रही है, ताकि इसका वैज्ञानिक रोपण नमूना तैयार किया जा सके। स्थानीय लोग कई बार इसे जलाने की लकड़ी की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं, जबकि यह ढलान और बंजर भूमि को स्थिर रखने में सहायक है। यदि इसकी वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जाए तो यह ग्रामीण आजीविका, औषधीय सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन-तीनों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।