राजस्थान के निकाय चुनावों के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा सरकार और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। गहलोत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें मुख्यमंत्री ने जोधपुर में भाजपा की वार्ड स्तर पर हार का उल्लेख किया था। गहलोत ने सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री के गृह जिले भरतपुर में भाजपा महज 20 सीटें जीतने के बावजूद अपना बोर्ड बनाने में कैसे सफल रही। भरतपुर नगर निगम के नतीजों में भाजपा को 20, कांग्रेस को सात और निर्दलीयों को 36 सीटें मिली थीं। भरतपुर में 65 सीटों का क्या था गणित? गहलोत ने कहा कि भरतपुर नगर निगम में कुल 65 पार्षद सीटें थीं। इनमें भाजपा ने 20, कांग्रेस ने सात और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 36 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को एक-एक सीट मिली थी। उनके मुताबिक, इन आंकड़ों के आधार पर निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से कांग्रेस समर्थित बोर्ड बनने की स्थिति बन रही थी, लेकिन बाद में घटनाक्रम बदल गया। विचित्रा सिंह के नामांकन वापसी पर उठाए सवाल गहलोत ने आरोप लगाया कि निर्दलीय महापौर प्रत्याशी विचित्रा सिंह को दबाव में लेकर नामांकन वापस करवाया गया। विचित्रा सिंह के नामांकन वापस लेने के बाद भाजपा की अनुराधा सिंह के निर्विरोध महापौर चुने जाने का रास्ता साफ हो गया था। इस घटनाक्रम की स्वतंत्र रिपोर्टों में भी पुष्टि हुई है। गहलोत का आरोप है कि विचित्रा सिंह पर प्रशासनिक दबाव बनाया गया और बाद में राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना नामांकन वापस लिया। हालांकि, नामांकन वापस लेने वाली विचित्रा सिंह ने अपने फैसले को भरतपुर के विकास से जुड़ा बताया था। यानी नामांकन वापसी की परिस्थितियों को लेकर कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोपों और प्रत्याशी की ओर से बताए गए कारणों में अंतर रहा। 'पुलिस का हस्तक्षेप नहीं था तो दबाव कैसे बना?' गहलोत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के उस दावे पर भी सवाल उठाया कि चुनावी प्रक्रिया में पुलिस का कोई हस्तक्षेप नहीं था। उन्होंने कहा कि अगर प्रशासन और पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी तो उम्मीदवारों को बुलाकर दबाव डालने की स्थिति कैसे बनी। पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पुलिस-प्रशासन के भय के कारण एक उम्मीदवार चुनावी मैदान से हट गया और इसके बाद भाजपा के लिए निर्विरोध जीत का रास्ता खुल गया। हालांकि, प्रशासनिक दबाव के इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और यह कांग्रेस नेताओं का आरोप है। इस घटनाक्रम पर अन्य रिपोर्टों में भी दबाव के आरोपों और प्रत्याशी के अपने फैसले के दावे दोनों का उल्लेख है। 'ऐसी घटनाओं को नहीं रोका तो गंभीर परिणाम होंगे' गहलोत ने कहा कि यदि ऐसी घटनाओं की निंदा नहीं की गई और पुलिस तथा प्रशासन के कथित हस्तक्षेप को नहीं रोका गया तो आने वाले समय में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता में कांग्रेस होती और इस तरह की घटना होती तो भाजपा की ओर से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जाते। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव प्रक्रिया के दौरान सभी राजनीतिक दलों को समान अवसर मिलना चाहिए। पश्चिम बंगाल का भी दिया उदाहरण पूर्व मुख्यमंत्री ने पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी सरकार बनने के बाद राजनीतिक विरोधियों और कार्यकर्ताओं को परेशान करने के आरोप सामने आते रहे हैं। गहलोत ने कहा कि राजस्थान में भाजपा या कांग्रेस की सरकार के दौरान सरकारी स्तर पर इस तरह की स्थिति पहले नहीं देखी गई। परिसीमन को लेकर भी गहलोत ने उठाए सवाल गहलोत ने निकाय चुनावों के लिए किए गए परिसीमन पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि वार्डों के पुनर्गठन में राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखा गया। उन्होंने कहा कि कुछ क्षेत्रों में कई वार्डों को मिलाकर एक वार्ड बनाया गया, जबकि दूसरे क्षेत्रों में वार्डों की संख्या बढ़ाई गई। परिसीमन को लेकर कांग्रेस की आपत्तियों और उसके संभावित चुनावी प्रभाव पर हालिया विश्लेषण में जयपुर, जोधपुर और कोटा के आंकड़ों की चर्चा की गई है। उस विश्लेषण में यह भी कहा गया कि परिसीमन के प्रभाव को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं मौजूद हैं। 'चुनाव जनादेश के सम्मान की प्रक्रिया' गहलोत ने कहा कि निकाय चुनाव के दौरान सामने आए घटनाक्रम से जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि चुनाव केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जनादेश के सम्मान की प्रक्रिया है। उन्होंने जनता और युवाओं से लोकतांत्रिक तरीके से ऐसे मामलों पर सवाल उठाने की अपील की। गहलोत ने दावा किया कि यदि चुनाव प्रक्रिया में कथित दबाव और प्रशासनिक हस्तक्षेप की परंपरा आगे बढ़ी तो आने वाले चुनावों में भी ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि जनता समय आने पर इसका जवाब देगी।