जिंदगी की पहली सांस ही संघर्ष से भरी थी। वजन महज 850 ग्राम, गर्भावस्था की अवधि सिर्फ 27 सप्ताह और जन्म के बाद सांस लेने में गंभीर परेशानी। हालात ऐसे थे कि हर पल चुनौती बना हुआ था। लेकिन जिला अस्पताल आलीराजपुर की एसएनसीयू टीम ने हार नहीं मानी। करीब 54 दिनों तक चले उपचार, चिकित्सकों की सतत निगरानी और मां की ममता ने मिलकर नन्हे नवजात को जिंदगी की जंग जिताई। 850 ग्राम वजन से शुरू हुआ सफर अब 1 किलो 430 ग्राम तक पहुंच चुका है। स्वस्थ होने के बाद बच्चा अपने घर लौट गया।
ग्राम राजावाट निवासी मना दीपक कनेश के नवजात शिशु का जन्म 25 जून 2026 को हुआ था। 27 सप्ताह में जन्म लेने के कारण उसका वजन बेहद कम था। जन्म के साथ ही बच्चे को सांस लेने में गंभीर परेशानी (आरडीएस-रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम) होने लगी। स्थिति को देखते हुए चिकित्सकीय टीम ने तत्काल वेंटिलेटर और सीपीएपी की सहायता दी। फेफड़ों के विकास के लिए बच्चे को सर्फेक्टेंट दवा भी दी गई।
नाजुक स्थिति के बीच बच्चे को सेप्सिस की समस्या भी हुई। इसके उपचार के लिए करीब तीन सप्ताह तक एंटीबायोटिक दवाएं दी गईं। शुरुआती दौर में बच्चा खुद दूध लेने की स्थिति में नहीं था, इसलिए ट्यूब के माध्यम से फीडिंग कराई गई। स्वास्थ्य में सुधार आने के बाद धीरे-धीरे कटोरी-चम्मच से दूध देना शुरू किया गया।
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मां की ममता बनी ताकत
पूरे उपचार के दौरान मां की भूमिका भी अहम रही। मां ने नियमित रूप से कंगारू मदर केयर (केएमसी) प्रदान की। बच्चे को लगातार चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया। उपचार के साथ उसके पोषण और संक्रमण से बचाव पर विशेष ध्यान दिया गया। धीरे-धीरे नन्हे शरीर ने उपचार का साथ दिया और उसका वजन बढ़ता गया।
आखिरकार 31 अगस्त 2026 को 54 दिन के उपचार के बाद नवजात को जिला अस्पताल की एसएनसीयू से स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज कर दिया गया। अस्पताल से छुट्टी के समय माता-पिता की खुशी साफ नजर आई। उन्होंने चिकित्सकों और पूरी एसएनसीयू टीम के प्रति आभार जताते हुए कहा कि अस्पताल की टीम के प्रयासों से उनके बच्चे को नई जिंदगी मिली। इस सफल उपचार में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सचिन पाटीदार, डॉ. शरद मसार, डॉ. दुष्यंत फूंकवाल सहित पूरी एसएनसीयू टीम और नर्सिंग स्टाफ का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
850 ग्राम से 1 किलो 430 ग्राम तक का यह सफर सिर्फ एक नवजात के स्वस्थ होने की कहानी नहीं, बल्कि समय से पहले जन्मे बच्चों के लिए चिकित्सा व्यवस्था, चिकित्सकों की मेहनत और मां की ममता से पैदा हुई उम्मीद की मिसाल है।