विज्ञापन

बस जी लो जरा

Srivastava Chemistry

Mere Alfaz
                                    
                     
                                                  क्यों व्याकुल हो
क्यों आकुल हो
थोड़ा ठहरो
निर्झर कल कल
शीतल जल थोड़ा पी लो
निहार लो
प्रकृति की छटा
सावन की मदमस्त घटा।
जीया अबतक गैरों के लिए
स्वेद लहू बहाया औरों के लिए।
क्यों व्याकुल हो
क्यों आकुल हो।
बस यूं हीं जी लो
स्वच्छंद मकरंद पी लो।
एक पल के लिए
जोड़ना घटाना छोड़ दो
खुशियों की तिज़ोरी खोल दो।
बार बार जीवन न पाओगे
इस धरा पर फिर से न आओगे।
वसंत और पतझड़ दोनो जीवन के अंत हैं
वैभव की अभिलाषा अनंत है
पर लालच में फसने का षडयंत्र है।
क्यूं व्याकुल हो
क्यूं आकुल हो।
साकल लगा कुछ पल के लिए
उन दिलों के दरारों पर
जिससे लगती है
लालच की तलब
जिससे चलती है
दुनिया की मकतब
और जिले बस कुछ चैन के पल
तू अनुभूति कर
स्व जीत की तू विभूति कर
मजहब और जात की परवाह ना कर
तू आदमी से इंसान बनाने की तलाश कर
तू प्यार से जीने की प्रयास कर

- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10278 कविताएं

View Profile