क्यों व्याकुल हो
क्यों आकुल हो
थोड़ा ठहरो
निर्झर कल कल
शीतल जल थोड़ा पी लो
निहार लो
प्रकृति की छटा
सावन की मदमस्त घटा।
जीया अबतक गैरों के लिए
स्वेद लहू बहाया औरों के लिए।
क्यों व्याकुल हो
क्यों आकुल हो।
बस यूं हीं जी लो
स्वच्छंद मकरंद पी लो।
एक पल के लिए
जोड़ना घटाना छोड़ दो
खुशियों की तिज़ोरी खोल दो।
बार बार जीवन न पाओगे
इस धरा पर फिर से न आओगे।
वसंत और पतझड़ दोनो जीवन के अंत हैं
वैभव की अभिलाषा अनंत है
पर लालच में फसने का षडयंत्र है।
क्यूं व्याकुल हो
क्यूं आकुल हो।
साकल लगा कुछ पल के लिए
उन दिलों के दरारों पर
जिससे लगती है
लालच की तलब
जिससे चलती है
दुनिया की मकतब
और जिले बस कुछ चैन के पल
तू अनुभूति कर
स्व जीत की तू विभूति कर
मजहब और जात की परवाह ना कर
तू आदमी से इंसान बनाने की तलाश कर
तू प्यार से जीने की प्रयास कर
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