लोक आस्था के केंद्र के रूप में पहचान रखने वाला भालौठ गांव आज भी अपनी करीब 600 साल पुरानी विरासत को संजोए हुए है। शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर सोनीपत रोड पर स्थित भालौठ गांव न केवल अपनी बसावट की कहानी के लिए खास है, बल्कि धार्मिक और सामाजिक ताने-बाने की वजह से भी पूरे जिले में अलग पहचान रखता है। भालौठ के ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार, करीब छह शताब्दी पहले भाल सिंह ने इस गांव बसाया। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम भालौठ पड़ा। दादरी क्षेत्र से आए फोगाट गोत्र के लोगों ने यहां रिहायस बनाई और चार पानों में गांव को व्यवस्थित तरीके से बसाया। पूर्व सरपंच बलजीत सिंह बताते हैं कि शुरूआती दौर में भालौठ 52 हजार बीघा जमीन पर फैला हुआ था। आज भी गांव में फोगाट गोत्र के परिवारों का बहुल है। उन्होंने कहा कि आपसी भाईचारे और एकजुटता के लिए यह गांव पूरे इलाके में मिसाल माना जाता है। सुरेश फोगाट का कहना है कि भालौठ की पहचान सिर्फ ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक भी है। गांव में गांव के ही रहने वाले महाराज जमनादास की तपोस्थली है। मान्यता है कि महाराज जमनादास ने यहीं वर्षों तक कठोर तपस्या और पूजा की थी। उनके तप के प्रभाव से ही गांव में सुख-समृद्धि आई। उन्हीं की स्मृति में हर साल चैत्र माह में होली के आठ दिन बाद यहां विशाल मेला लगता है। मेले में कुश्ती दंगल मुख्य आकर्षण होता है। दूर-दराज से आए नामी पहलवान यहां जोर आजमाते हैं।