लंपी की वैक्सीन बनाई जा चुकी है। मगर ड्रग कंट्रोलिंग अथॉरिटी जब तक अप्रूव नहीं करेंगे तब तक मार्केट में वैक्सीन को नहीं बेच सकते। इसका लंबा प्रोसेस है। इसमें एक से डेढ़ साल का समय लग जाता है। बायोवेट कंपनी को अप्रूवल भी मिल गया और क्वालिटी कंट्रोल भी हो गया। उनका प्रोडेक्ट भी तैयार है। जब मांग आ जाएगी तो वह तुरंत सप्लाई कर देंगे। यह कहना है राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. टीके भट्टाचार्य का। वह संस्थान के स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में अमर उजाला से बातचीत कर रहे थे। इस दौरान घोड़ों में ग्लैंडर्स बीमारी के बढ़ रहे केस के बारे में उन्होंने कहा कि अभी तक ग्लैंडर्स की न तो वैक्सीन है और न ही ट्रीटमेंट है। मगर इसमें नेशनल एक्शन प्लान को फोलो करना पड़ता है। जैसे संक्रमित घोड़े को मार दिया जाता है। इसके अलावा 10 किलोमीटर एरिया में 6 माह तक उस एरिया में घोड़ों का आवागमन बंद कर दिया जता है। संस्थान में इस बीमारी की वैक्सीन तैयार के लिए रिसर्च चल रही है। वहीं आईसीएआर के डेयरी एवं वित्तीय सलाहकार संदीप सरकार ने कहा कि पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की कई योजनाएं चल रही हैं। आईसीएआर में हमारा फोकस नई टेक्नोलॉजी को विकसित करने पर रहता है। हमारी कोशिश रहती है कि नई टेक्नोलॉजी को निशुल्क या फिर कम रेट में किसानों को उपलब्ध करवाई जाए ताकि पशुपालन से जुड़ी समस्या का समाधान हो सके। उन्होंने कहा कि पशुओं में ज्यादातर बीमारी की समस्या होती है। इसके लिए किट डवल्प की है। कई जगह निशुल्क भी किट वितरित की जाती है। इससे किसानों को पशुओं में बीमारी होने का समय से पता चल जाता है। उसके बाद वह ट्रीटमेंट करवाते हैं।