E-Waste Day 2022: ई-कचरे का डंपिंग ग्राउंड न बन जाए भारत, उठाने होंगे ये बड़े कदम, दिल्ली की हालत सबसे खराब
E-Waste Day 2022: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक 2019-20 में देश में 10 लाख 14 हजार 961.2 टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट पैदा हुआ। देश की राजधानी दिल्ली की ही बात करें, तो यहां हर साल दो लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। यह देश में निकलने वाले कुल ई-वेस्ट का लगभग 10 फीसदी है...

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मोबाइल, लैपटॉप, पीसी, टीवी, एसी, रेफ्रिजरेटर, मिक्सर, ग्राइंडर समेत न जाने कितनी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज हमारी जिंदगी को आसान बनाती हैं। हॉस्पिटल में मेडिकल जांच से लेकर ट्रेन की रफ्तार और हवाई जहाज की उड़ान इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से ही संभव हो पाती है। जैसे-जैसे हमारी जिंदगी में इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल सेवाओं पर निर्भरता बढ़ रही है। वैसे वैसे उसी अनुपात में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं अब कचरे की शक्ल भी ले रही हैं। यूनाइटेड नेशंस द्वारा जारी ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020 रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में लगभग 5.36 करोड़ मीट्रिक टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा सामने आया था। रिपोर्ट के मुताबिक इस दशक के अंत तक यह 7.4 करोड़ मीट्रिक टन हो जाएगा। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक 2019-20 में देश में 10 लाख 14 हजार 961.2 टन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट पैदा हुआ। देश की राजधानी दिल्ली की ही बात करें, तो यहां हर साल दो लाख टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। यह देश में निकलने वाले कुल ई-वेस्ट का लगभग 10 फीसदी है।
2019 में एशिया में 2.49 करोड़ टन ई-वेस्ट पैदा हुआ
2019 में अकेले एशिया में सबसे ज्यादा 2.49 करोड़ टन ई-वेस्ट पैदा हुआ। पर्यावरण के लिए चनौती बन रहे इस संकट के समाधान के लिए हर साल 14 अक्तूबर को इंटरनेशनल ई-वेस्ट डे मनाया जाता है। इस दिन इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट से निपटने के उपायों पर दुनिया भर के पर्यावरणविद् व वैज्ञानिक चर्चा करते हैं। भारत जिस तेजी से तकनीक आधारित डिजिटल इकोनॉमी की ओर कदम बढ़ा रहा है, उसके साथ ही इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट भी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। ई-वेस्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (ईईई) नोटिफाई किए गए हैं। ये उपकरण एक समय के बाद ई-वेस्ट में तब्दील हो जाते हैं। वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट (WEEE) फोरम द्वारा 2018 में इसकी शुरुआत की गई।
ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करना होगा
भारत समेत 32 देश इसके सदस्य हैं। इसमें 46 देशों के प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी ऑर्गेनाइजेशन को जगह दी गई हैं, इसका उद्देश्य दुनिया भर में ई-वेस्ट प्रबंधन की विशेषज्ञता साझा करना है। इस संस्था ने ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए उच्च गुणवत्ता के मानक विकसित किए हैं। यह स्टैंडर्ड ई-वेस्ट कलेक्शन, स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन, उसके री-यूज, रीसाइक्लिंग से जुड़े हैं।
अमर उजाला से चर्चा में ई-वेस्ट पर संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा रह चुकी हैं डॉ हरवीन कौर ने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट प्रबंधन के लिए सस्टेनेबल इलेक्ट्रॉनिक्स रीसाइक्लिंग इंटरनेशनल (सेरी) ने आर-2 मानक तैयार किए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के सस्टेनेबल साइकिल कार्यक्रम के तहत ई-वेस्ट प्रबंधन को लेकर गाइडलाइन तैयार की हैं। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ई-वेस्ट का वर्गीकरण किया गया है। ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए मानक भी तैयार किए गए हैं। इस साल ई-वेस्ट डे को 'रिसाइकिल इट ऑल, नो मैटर हाउ स्माल थीम' दी गई है। यानी ई वेस्ट का आकार छोटा हो बड़ा, उसकी रिसाइकलिंग को प्रोत्साहित करना होगा। पिछले कुछ दशकों में जिस तरह पर्यावरण को लेकर दुनिया भर में संजीदगी बढ़ी है, उसे देखते हुए भारत जलवायु संकट के समाधान की पहल के केंद्र में है।
ई-वेस्ट प्रबंधन ईएसजी और पर्यावरणीय पहल का हिस्सा बने
पर्यावरण व ऊर्जा मामलों के जानकार और लेखक अरविंद मिश्रा अमर उजाला से चर्चा में कहते हैं कि देश में ई-वेस्ट प्रबंधन पर कई मोर्चे पर काम करना होगा। सबसे पहले संसाधनों के उचित उपयोग के लिए लोगों को संवेदनशील बनाना होगा। इससे लोग इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के बेतहाशा उपयोग से बचेंगे (रिड्यूस), इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के दोबारा इस्तेमाल के लिए (रीयूज) प्रोत्साहित होंगे। इसका तीसरा चरण रिसाइकिलिंग के रूप में सामने आता है। इसके लिए सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र को इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना होगा। दुनिया भर में कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए ईएसजी (एनवायरमेंट, सोशल एंड कॉर्पोरेट गवर्नेंस) रिपोर्टिंग अनिवार्य किया जा रहा है। ऐसे में ई-वेस्ट प्रबंधन को ईएसजी और पर्यावरणीय पहल का हिस्सा बने।