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अब वो बात ही कहां

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब हिज़्र के इज़हार में , वो बात ही कहां।
        
                                                    
                            
बहते अशकों की धार में,वो बात ही कहां।।

बढ़ती हुई तन्हाई ने,तोड़ डाले बंधन सभी।
आंगन में खड़ी दीवार में,वो बात ही कहां।।

बरसते हुए बादलों ने समझाया है हमको।
सच है, खस-ओ-खार में वो बात ही कहां।।

अना को भी हमने, कभी का दफ़ना दिया।
देख फांसले-ओ-दरार में वो बात ही कहां।।

एक दौर में आहट से पहचान लेते थे तुझे।
मगर अब,तेरी रफ्तार में वो बात ही कहां।।

उलझनें सुलझाते थे, तुझसे मिलकर हम।
उसी दर-ए-यार में , अब वो बात ही कहां।।

अब, हस्ब-ए-जरूरत फैंसले लेने लगे तुम।
हां, अब मेरे इख्तियार में वो बात ही कहां।।

बज़्म-ए-तरब और मातम एक से लगते हैं।
यूं मौसम-ए-बहार में भी, वो बात ही कहां।।
-यूनुस खान
13 घंटे पहले
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