तुम्हें प्रेम प्रतीक कैसे मैं कह दूं, हे ताज तुम्हीं बतला देना
याद करो उन सबको, जिस-जिस ने तुम्हें बनाया था
पाषाणों पर घिस-घिस छेनी, बरसों पीड़ा सह-सह कर
कितने बेदम हो गए, कितनों ने प्राण गवाया था
फिर भी सब अड़े रहे, गढने में तुझको लगे रहे
तब जाकर तुझमें यौवन बीस बरस में आया था
पाकर श्वेत बदन तुमने सब नयनों को भरमाया था
तू फूला नहीं समाया था, शाहजहां भी खूब इतराया था
पर मिला ही उनको क्या आखिर, जिस-जिस ने तुम्हें बनाया था
शंकाओं से घिरा शाहजहां वहशियत से भर आया था
तुमसा कहीं और न हो जग में, यह ख्याल उसे आया था
दिया आदेश, काट दो हाथ, ताजमहल गढने वालों के
सब शिल्पी सुन आवाक हुए, जो इनाम बतलाया था
बीस हजार मजदूरों में तब भय भी भीषण छाया था
शमशीर चली सबके ऊपर, सबने हाथ गंवाया था
चित्कार, रुदन से वातायन में घनघोर अंधेरा छाया था
गूंज रही थीं आहें उनकी जिस-जिस ने तुम्हें बनाया था
चाहत का तुम भ्रम फैला आपना इतिहास छुपा बैठे
रक्तिम इतिहास को जालिम ने जब प्रेममयी बतलाया था
- विजय शंकर विद्रोही (कवि, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता)
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