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प्रिय, कब तक हम प्रणय गीत गाते

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            प्रिय, कब तक हम प्रणय गीत गाते,
        
                                                    
                            
तुंग हिमालय पर चढ़कर।
प्रिय, तेरा ही बस ध्यान किया है,
कुछ लिखे अधूरे पन्नों पर
बस तेरा ही गुणगान किया है।

तुम स्वर्गलोक से उतरी थीं,
मैं मृत्यु लोक का वासी था।
इन नयनों में कुछ शेष न था,
बस तेरा दर्शन काफ़ी था।
सब कुछ तो मैं हार गया,
हर दुविधा से मैं पार गया,
पर इस जीवन के कोलाहल में
कैसे हम रह पाते?

प्रिय, कब तक हम प्रणय गीत गाते।

जीवन का सत्य खोजने को
मन व्याकुल हो फिरता था।
ये रास-रंग सब फीके थे,
अंदर ही अंदर मरता था।
मैं नहीं बुद्ध-सा त्याग सका
तुमको और तेरी यादों को,
पर तुम शायद सुन न सकीं
मेरी इन सब फ़रियादों को।
तेरे पास कभी आकर
हम सारी बातें कह पाते।

प्रिय, कब तक हम प्रणय गीत गाते।

अधरों की प्यास अधूरी थी,
पर शायद कुछ मजबूरी थी।
ये शिखर तुम्हारा धाम न था,
रुक जाना तेरा काम न था।
तुमको सागर तक जाना था,
राहें अलग बनाना था।
तुम मेरे द्वार से गुज़र गईं,
केवल कुछ यादें छोड़ गईं।
कैसे तेरी यादों की,
हम आहुति दे पाते?

प्रिय, कब तक हम प्रणय गीत गाते।
— गोपाल अवस्थी
एक महीने पहले
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