किसे अच्छा लगता है
अपना घर छोड़ना,
वो आँगन छोड़ना
जहाँ बचपन दौड़ा था,
वो चौखट छोड़ना
जहाँ माँ आज भी
रास्ता देखा करती है।
किसे अच्छा लगता है
अपनी मिट्टी से
अपनी ही जड़ें उखाड़ना?
हम लोग घर छोड़ते नहीं,
हमें छोड़ना पड़ता है।
वो खेत हमारे,
वो पगडंडी अपनी,
वो पीपल की ठंडी छाँव,
वो सुबह की नरम धूप,
वो साँझ को लौटता गाँव
सब वहीं रह जाता है,
बस आदमी चला आता है।
क्योंकि भूख
यादों से नहीं मिटती,
और चूल्हा
सिर्फ़ आँसुओं से नहीं जलता।
दो वक्त की रोटी के लिए
कभी शहर बुलाता है,
कभी कोई परदेस
और आदमी
अपना पूरा गाँव
आँखों में भरकर
निकल पड़ता है।
हम लोग घर छोड़ते नहीं,
हमें छोड़ना पड़ता है।
यहाँ आकर
हम इमारतें उठाते हैं,
सड़कें बनाते हैं,
कारखाने चलाते हैं,
पत्थर तोड़ते हैं,
पसीना बहाते हैं।
शहर की चमक में
हमारे हिस्से का भी
थोड़ा-सा पसीना होता है।
फिर भी न जाने क्यों
अपने ही देश की धरती पर
कभी-कभी हमें
‘बाहरी’ कहा जाता है।
जैसे इस देश की मिट्टी पर
हमारा कोई हक़ नहीं,
जैसे राज्य की सरहद पार करते ही
देश भी बदल गया हो।
हम चुप रहते हैं।
इसलिए नहीं
कि दर्द नहीं होता,
इसलिए कि गाँव में
कोई हमारा इंतज़ार कर रहा होता है।
किसी बूढ़े पिता की दवा,
किसी माँ की उम्मीद,
किसी बच्चे की किताब,
किसी बेटी की फीस
हमारी जेब में नहीं,
हमारे पसीने में पलती है।
इसलिए
चुभती निगाहों के तीर भी
खामोशी से सह लेते हैं।
अपमान का घूँट पीकर भी
अगली सुबह
काम पर निकल जाते हैं।
हम लोग घर छोड़ते नहीं,
हमें छोड़ना पड़ता है।
रात को जब
शहर सो जाता है,
तब गाँव जागता है
हमारी स्मृतियों में।
माँ की भीगी आँखें,
घर की सूनी चौखट,
खेतों की मेड़,
पीपल की छाँव
सब एक-एक करके
पास आ बैठते हैं।
और मन पूछता है
जिस धरती पर जन्म लिया,
उसे छोड़कर क्यों आए?
जवाब में
जेब में पड़े कुछ रुपये
धीरे से खनकते हैं
और याद दिलाते हैं,
रोटी की भी
अपनी मजबूरियाँ होती हैं।
हम परदेसी नहीं थे,
हालात ने हमें परदेसी बनाया।
हम बेघर नहीं थे,
रोज़गार ने हमें
घर से दूर किया।
हमने अपनी मिट्टी नहीं छोड़ी,
बस पेट की आग बुझाने
कुछ दूर चले आए हैं।
इसलिए
जब किसी मजदूर को
किसी स्टेशन पर
एक गठरी उठाए देखो,
जब किसी परदेसी को
त्योहार की रात
अकेले बैठे देखो,
तो यह मत समझना
कि उसे अपना गाँव
याद नहीं आता।
हो सकता है
उसकी पूरी दुनिया
उसी गठरी में बँधी हो।
हो सकता है
उसकी आँखों में
जो नमी दिखाई दे रही है,
वह किसी गाँव की
मिट्टी की खुशबू हो।
क्योंकि
हम लोग घर छोड़ते नहीं,
हमें छोड़ना पड़ता है।
रोटी की खातिर
अपनों से दूर रहना पड़ता है,
अपने ही देश में
कभी ‘बाहरी’ कहलाना पड़ता है,
और कई बार
जीने की खातिर
थोड़ा-थोड़ा
हर रोज़ मरना पड़ता है।
हम लोग घर छोड़ते नहीं...
हमें छोड़ना पड़ता है।