पन्नों का स्पर्श
क्या कहा?!
पन्नों का स्पर्श!
हैं! हैं! क्या
फिर से किताबें
लौट आई हैं।
डिजिटल के पीछे भागा ,
पाठक और पठन वृत्ति
लौट आई है!।
वो शब्दों की
कीमियागरी
वो दृश्य श्रव्य की जादूगरी!
क्या लौट आई हैं।
स्मृतियों,श्रुतियों की
कितनी-कितनी मधुर बातें!
क्या लौट आई हैं?
वो किताबों के गुलाब
वो कितने कितने प्रेमिल
अहसास ए मुहब्बत
क्या?!
फिर से लौट आई हैं।
वो किताबों की दुकानें,
मेले,
वो ठाठ से ठेले पर
इठलाती किताबें
क्या लौट आई हैं।
वो ख़्वाबों ख्यालों के
तसव्वुर और तस्वीरें
लौट आई हैं।
वो नज़रों का टकराना,
सुर्ख चेहरे कांपते हाथों से
किताबों के गिरने की शरारतें
क्या सच में लौट आई हैं।
वो किताबों में छुपे
मुहब्बत के पैग़ाम की
रस्में!!!!
क्या फिर से लौट आई हैं।
क्या किताबों के पन्नों का
स्पर्श करके
अपना मुस्तकबिल
बुलंद करने
वाली पीढ़ी
लौट आई हैं।
कोई शिकवा नहीं
कोई शिकायत भी नहीं,
डिजिटल या नई ऑनलाइन
तकनीकी किताबी अवतार से।
पर क्या किताब के पन्नों को
स्पर्श करके,
ज्ञान से आलोकित होने के
संस्कारी रस्मों रिवाज़
लौट आई हैं???!
-सूर्यकांत शर्मा