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चल रे मन बैरागी ,,,

Surya Kant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चल रे मन बैरागी ,,,
        
                                                    
                            

चल रे मन बैरागी
हो जा,
छोड़ सारे द्वंद्व
अब हरि चरण
अनुरागी हो जा।
चल रे मन बैरागी
हो जा ,,,
छोड़ सारे बँध
प्रारब्ध अतीत
औ वर्तमान के
अब तू उसके
संग का बड़भागी
हो जा।
चल रे मन,,,
बहुत हुई,
जीवन की भाग-दौड़
व्यवहार की जोड़- तोड़,
छोड़ छाड़ अब
रंग रूप रस रास
गंध,
बस अब तू सत्संगी
हो जा।
चल रे मन बैरागी
हो जा,,,,

कामनाओं की
कमान से प्यार
मुहब्बत राग द्वेष
के इंद्रधनुषी बाणों
से बिन्ध कर,
मत भीष्म सा तू
सो जा।
अहम वहम की
बयार से
बच कर अब तू
गृहस्थ से संन्यासी
हो जा।
चल रे मन अब
बैरागी हो जा।
सुख दुख की बदली
से निकल,
नवधा भक्ति और
अध्यात्म की ओट में
गीता पढ़ कर
अब तू बस स्थितप्रज्ञ
सा हो जा।
चल रे मन अब तू
बैरागी हो जा।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
6 घंटे पहले
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