पूँछ लेना चाहूंगा कभी ,
वो मिले तो सही !
कैसे एक साँचे में ढले होते हैं सब ,
कैसे नाप -तौल होती हैं
आखिर किसकी निगरानी में ,
सटीक एक -एक ,
पत्ते-पत्ते पर ,
एक रूप लिये एक ही रंग
एक ही नक्काशी ,
सोच से परे ,
अदृश्य होकर भी सदृश्य !
व्याप्त सब में ॥
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।