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अदृश्य वो ....

                
                                                         
                            पूँछ लेना चाहूंगा कभी ,
                                                                 
                            
वो मिले तो सही !
कैसे एक साँचे में ढले होते हैं सब ,
कैसे नाप -तौल होती हैं
आखिर किसकी निगरानी में ,
सटीक एक -एक ,
पत्ते-पत्ते पर ,
एक रूप लिये एक ही रंग
एक ही नक्काशी ,
सोच से परे ,
अदृश्य होकर भी सदृश्य !
व्याप्त सब में ॥


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6 वर्ष पहले

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