विज्ञापन

गज़ल

Ssoumya Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नहीं चलती कोई तलवार पानी पर,
        
                                                    
                            
कि ख़ाली जाता है हर वार पानी पर।

तुझे मिलने की ख़ातिर शौक़ से ऐ जाँ,
मैं चलकर आता था हर बार पानी पर।

हमारी रंजिशों ने दिल के आँगन में,
बना रक्खी है इक दीवार पानी पर।

मुझे वो झील पर मिलने को आया फिर,
मुझे होने लगा दीदार पानी पर।

गले मिलने लगीं परछाइयाँ दोनों,
मिलन होने लगा साकार पानी पर।

कभी चलते कभी हम डूब जाते हैं,
किए हैं तज्रिबे ऐ यार पानी पर।

यहाँ हर साल जब बरसात आती है,
तो बनवाती है यह घरबार पानी पर।

मुझे कल शाम इक मंज़र दिखा जिसमे,
सभी मे हो रही थी मार पानी पर।

ग़ज़ब है लोग पानी बेच देते हैं,
चला रक्खे हैं कार ओ बार पानी पर।

लफ़्ज़ लिखता हूँ मआनी खोलकर,
बात में पूरी कहानी खोलकर।

रूह के छाले उभर आते है फिर,
देखता हूँ जब जवानी खोल कर।

एक के अंदर हज़ारो थी रखी,
एक दिन देखा कहानी खोल कर।

लग गया हाथों में तब बेरँग ख़ून,
मैं ने जब देखा था पानी खोल कर।


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10278 कविताएं

View Profile