नहीं चलती कोई तलवार पानी पर,
कि ख़ाली जाता है हर वार पानी पर।
तुझे मिलने की ख़ातिर शौक़ से ऐ जाँ,
मैं चलकर आता था हर बार पानी पर।
हमारी रंजिशों ने दिल के आँगन में,
बना रक्खी है इक दीवार पानी पर।
मुझे वो झील पर मिलने को आया फिर,
मुझे होने लगा दीदार पानी पर।
गले मिलने लगीं परछाइयाँ दोनों,
मिलन होने लगा साकार पानी पर।
कभी चलते कभी हम डूब जाते हैं,
किए हैं तज्रिबे ऐ यार पानी पर।
यहाँ हर साल जब बरसात आती है,
तो बनवाती है यह घरबार पानी पर।
मुझे कल शाम इक मंज़र दिखा जिसमे,
सभी मे हो रही थी मार पानी पर।
ग़ज़ब है लोग पानी बेच देते हैं,
चला रक्खे हैं कार ओ बार पानी पर।
लफ़्ज़ लिखता हूँ मआनी खोलकर,
बात में पूरी कहानी खोलकर।
रूह के छाले उभर आते है फिर,
देखता हूँ जब जवानी खोल कर।
एक के अंदर हज़ारो थी रखी,
एक दिन देखा कहानी खोल कर।
लग गया हाथों में तब बेरँग ख़ून,
मैं ने जब देखा था पानी खोल कर।
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