विज्ञापन

घटते जल का डर

Santosh Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जल ही जीवन का चालक है
        
                                                    
                            
इसकी न मौजूदगी सबसे घातक है,
यही जीने का आधार हमारा
अब घटता जा रहा ये जल सारा।

बर्बादी का कारण है बनता
क्यों करती है ये सब जनता,
बचाने का था प्रयास हमारा
अब घटता जा रहा ये जल सारा।

विरासत से हमें उपहार में मिलता
पर अग्रिमों को खोता हुआ दिखता,
न जाने वो लेंगे किसका सहारा
अब घटता जा रहा ये जल सारा।

क्या देंगे जबाब उन्हें हम कल को
पूछेंगी ये सवाल अग्रिम पीढ़ी हमको,
कहां है हमारे हक का पिटारा
अब घटता जा रहा ये जल सारा।

नहीं पड़ रहा असर मनुष्य के पत्थर दिल पर
खुद करके अनदेखा उंगली उठाता औरों पर,
यही रहा तो एक दिन मिट जायेगा सर्वस्व हमारा
अब घटता जा रहा ये जल सारा।


 सन्तोष यादव


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10278 कविताएं

View Profile