सतयुग के दसरथ से महान
कलयुग का दशरथ, एक राजा था
एक रंक, एक भोगी था, एक कर्मयोगी
मांझी गरीब है, दिन हीन, लाचार
किन्तु विचारों से महान है
जिसके ह्रदय में सागर का तूफान है
क्योंकि की तोड़ना है उसे एक पहाड़
चिरनी है छाती, एक पहाड़ की
निकालना है रास्ता, स्वयं के लिए नहीं
परमार्थ में
भान हैं न आपको
शाहजहां ने भी
बनवाया था ताजमहल, प्रेम का एक स्मारक
मुमताज के प्रेम में बना
बाइस वर्षों के प्रयास से, अनवरत
दशरथ मांझी ने भी फगुनी देवी की याद
में बनाया एक स्मारक
तीन सौ फिट ऊँचे और तीन सौ फिट लम्बें
पत्थर की छाती तोड़कर, छैनी और हथौड़े
की चोट से, अपने पुरषार्थ से, अपने पसीने की धार से
एक ऐसा स्मारक जिसे सदियां
करेंगी याद, सवर्दा, सतत
प्रकृति के रोड़े को तोड़ते पत्थर के बीच
उफ, नहीं नहीं, यह तो दशरथ मांझी
के शब्दकोष में थी ही नहीं
यदि कोई तथाकथित 'बड़ा' इसे करता तो
उसे मिलता भारतरत्न, विनम्र प्रयत्न
किन्तु दशरथ मांझी गरीब हैं, दलित है
महादलित हैं
कौन दिलाये उसे सम्मान
जिसकी पूंजी रही है, सदियों से, मात्र
उपेक्षा या अपमान
पहाड़ों को काट कर बना रास्ता, वस्तुत:
एक स्मारक है, अमर स्मारक
मांझी के प्रेम की निशानी, अपनी फागुनी के लिए
लेकिन वह मार्ग बन गया सुमार्ग
उसके बाईस वर्षों का अकथ प्रयास,
छेनी और हथौड़े की चोट और साथ में
अनन्त, अनवरत, कठिन श्रम का
फल, सच है एक गरीब ठान ले तो
इतिहास बदल देता हैं, यही थी
दसरथ मांझी की, जिजीविषा
पहाड़ों की छाती को चिरकर बना मार्ग, या
स्वर्ग का सुख जाने के समान
आइये
इसे सराहें सुगन्धित हवा के झोंके की तरह
उसके श्रम स्वेद की करे वंदना
क्योंकि
दशरथ मांझी आज व्यष्टि से
समष्टि का परिचायक बन चुका है
बन चुका है व्यक्तिवाचक से भाववाचक
लाख आभावों के बाद भी।
-संतोष पटेल
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