मैं आऊं जब तेरे आँगन
वो घर मन्दिर बना देना।
बनना तुम आराध्य मेरे
मुझे आराधन बना लेना ।।
मैं नदिया बनके आऊंगी
मैं लहरें बन रिझाऊंगी ।
मुझे आगोश में प्रियतम
समन्दर बन समा लेना ।।
मधुर हो जब तलक श्वर तो
अकेले गुनगुना लेना ।
भर आये दर्द से दिल
तो श्वर मेरा मिला लेना ।।
सहूंगी टूटकर हर ग़म
रहे बस तेरी दम तक दम ।
सजल हो जब नयन मेरे
जरा तुम मुस्करा देना।
छोड़कर कुटिया बाबुल की
तुम्हारे महल आऊंगी ।
बनू न रुक्मिणी राधा
मुझे मीरा बना लेना ।।
--पुष्पेन्द्र गोकुल प्रसाद 'अनन्तू'
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