ख़ुद ही ख़ुद को ख़र्च किया था,
नहीं किसी ने हर्ज़ किया था,
मुझको भी अच्छा बनना था,
जाने कहाँ से मर्ज़ लिया था,
अपनी ख़ुशियाँ बाँट के देखीं,
हर आँसू पर फ़र्ज़ किया था,
दिल की बातें दिल में रख कर,
चेहरे पर बस दर्ज़ किया था,
टूटी साँसों को भी सी लूँ
हुनर एक ऐसा अर्ज़ किया था,
सबकी ख़ातिर जीना सीखा,
अपने हिस्से का क़र्ज़ किया था।।
-पूजा आर श्रीवास्तव