सारी झूठी खबरों की अखबार बनी बैठी हो तुम।
मेरी गर्दन पर शातिर तलवार बनी बैठी हो तुम।
संविधान के पृष्ठों पर तुम संसद की लाचारी हो,
चाहे न्याय भले ना दे पर मुझको तुम ही प्यारी हो।
सारे प्रणय निवेदन तुम पर आकर ठहरे हैं क्योंकि,
मेरी दिल की दुनिया की सरकार बनी बैठी हो तुम।
जब तक नज़रें बेहतर हैं तो हुस्न भी अच्छा लगता है,
वो वस्ल तो सबसे आला है,ये हिज्र भी अच्छा लगता है।
मुझको तुमसे दूर करें तो ईस भी कातिल होगा,
तेरे बिन जो जिया जाए वो जीवन कैसा होगा।
कल तेरे मेरे फर्क फ़ना हो जाएंगे यह सच है पर,
आज अभी इस दूरी का होना भी अच्छा लगता है।
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